Friday, 16 October 2020

Paint faad faishan : पैंट फाड़ फ़ैशन

खरी खरी - 714 : पैंट फाड़ फैशन

      आजकल हम देखते हैं कि युवक- युवतियां घुटने से नीचे और घुटने से ऊपर, जांघ के ऊपरी सिरे से थोड़ा नीचे तक, कई जगह से फटी जीन्स पहन कर खुलेआम घूम रहे हैं । सबसे पहले मैंने यह दृश्य मेट्रो ट्रेन में देखा । उसके बाद इसी तरह की फटी जीन्स पहने प्रेमी जोड़ों को मेट्रो स्टेसन की सीढ़ियों में सट कर गर्दन एक -दूसरे की ओर झुकाए बैठे देखा । जंतर मंतर की ओर गैरसैण के लिए धरना-प्रदर्शन के लिए जा रहा था तो रास्ते में भी कई फटेहालों को देखा । कुछ मित्रों से पूछा तो वे बोले, "सर ये फटीचर नहीं हैं, ये फटेहाल गरीब नहीं हैं ,ये फैशन के फरिश्ते हैं । बाजार में फटी पैंट पहनने का नया फैशन आ गया है ।" मैं सोचने लगा 'यदि कमर से ऊपर के फटे वस्त्र पहनने का फैशन भी आ गया तो तब देश का क्या होगा ?"

      इसी सोच में मुझे अपने मिडिल स्कूल का जमाना याद आ गया जब मैं और मेरे जैसे कई छात्र तीन टल्ली (पैबंद) लगी सुरर्याव (पैंट) पहने स्कूल जाते थे । हमारे घरवाले पैंट फटने पर उस पर तुरन्त टल्ली लगवा देते थे । हम फटी पैंट पहन कर कभी बाहर नहीं गए । परन्तु आज जमाने की बलिहारी देखो युवा फैशन के नाम पर पैंट फाड़े सीना तान कर चल रहे हैं । वाह रे ! पैंट-फाड़ फैशन । युवतियों की फटी पैंट पर एकबारगी नजर पड़ते ही नजर झुक जाती है । मेरा आश्चर्य का ठिकाना तो तब नहीं रहा जब एक लड़का बोला, "अंकल इन फटी पैंटों की कीमत बिनफटी पैंटों से अधिक है, क्योंकि यह फैशन की फाड़ है ।"

     अब तो फटी पैंटों को देख आश्चर्य भी नहीं होता, शायद नैनों ने समझ लिया है कि इस तरह के वस्त्र- फाड़ अंग-दिखाऊ नए नए फैशन आने वाले वक्त में देखने को मिलते रहेंगे और हमारी सभ्यता को मुँह चिढ़ाते रहेंगे । वस्त्र डिजायनर कहीं हमें पुनः उसी युग में तो नहीं ले जाना चाहते जिस युग में सबसे पहले मानव ने पेड़ों की छाल और पत्तों से शरीर ढकना सीखा था ?

पूरन चन्द्र काण्डपाल
17.10.2020

Thursday, 15 October 2020

Rona naheen : रोना नहीं

खरी खरी - 713 : रोना नहीं 

(कोरोना से लड़ने वालों को समर्पित )


 


रोने से कभी 


कुछ नहीं मिलता,


रह नहीं  गए अब 


आंसू  पोछने वाले ।


.


दूर क्यों जाते हो


खोजने -ढूढने उन्हें,


तुम्हारे सामने ही हैं 


पीठ पीछे बोलने वाले।

भरोसा मत करो


दिल अजीज कह कर,


शरीफ से लगते हैं


छूरा घोपने वाले।


 


संभाल अपने को 


मतलब परस्तों से,


देर नहीं लगायेंगे 


भेद खोलने वाले।


 


साथ देने की कसम पर


यकीन मत कर इनकी,


बहाना ढूढ़ लेते हैं


साथ छोड़ने वाले।


 


धर्म और मजहब सब 


एक ही सीख देते हैं,


मतलब जुदा निकाल लेते हैं 


समाज तोड़ने वाले।


 


अपने घर की बात


घर में ही रहने दो,


लगाकर कान बैठे हैं 


घर को फोड़ने वाले।


 


दो बोल प्रेम के 


बोल संभल के ' पूरन '


नुक्ता ढूढ़ ही लेंगे 


तुझे टोकने वाले।

आजकल घर से बाहर तू


निकल कदम फूक -फूक कर,


घुस सकते हैं तुझ में


वायरस कोरोना वाले ।

एक नज़र उनकी 


तरफ भी देख जी भर,


बड़ी हिम्मत से जूझ रहे हैं


क्रूर कोरोना से लड़ने वाले।

करते हैं दिल से सलूट


इन साहसी कर्मवीरों को,


अथाह हिम्मत वाले हैं 


ये कोरोना को भगाने वाले ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल


16.10.2020


 


Wednesday, 14 October 2020

Maryada purushotam shree Ram ;मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम

बिरखांत – 340 :  मर्यादा पुरुषोतम श्रीराम 


 


       रामलीला के इस मौसम में श्रीराम का स्मरण ह्रदय से हो जाए तो अच्छा है | बताया जाता है कि श्री राम का जन्म आज से लगभग सात हजार वर्ष ( बी सी ५११४ )पूर्व हुआ | कुछ लोग इस पर भिन्नता रखते हैं | पौराणिक चर्चाओं में अक्सर मतान्तर देखने-सुनने को मिलता ही है | श्रीराम की वंशावली की विवेचना में मनु सबसे पहले राजा बताये जाते हैं | इक्ष्वाकु उनके बड़े पुत्र थे |  आगे चलकर वंशावली में ४१वीं पीढ़ी में राजा सगर, ४५ वीं पीढ़ी में राजा भगीरथ, ६०वीं में राजा दिलीप बताये जाते हैं | दिलीप के पोते रघु, रघु के पुत्र अज, अज के पुत्र दशरथ और दशरथ के पुत्र श्रीराम जो ६५वीं पीढ़ी में थे | 

     वाल्मीकि के राम मनुष्य हैं | तुलसी के राम ईश्वर हैं | कंबन ने ११वीं सदी में कंबन रामायण लिखी और तुलसी ने १६वीं सदी में रामचरित मानस | अल्मोड़ा से प्रकाशित ‘पुरवासी-२०१२’ में डा. एच सी तेवाड़ी (वैज्ञानिक) का लेख श्रीराम के बारे में कई जानकारी लिए हुए है | श्रीराम तेरह वर्ष की उम्र में ऋषि विश्वामित्र के आश्रम में गए | वहाँ से मिथिला नरेश जनक- पुत्री सीता से उनका विवाह हुआ  | २५ वर्ष (कुछ लोग १४ वर्ष भी कहते हैं ) की उम्र में उन्हें वनवास हुआ | १४ वर्ष वन में बिताने के बाद वे ३९ वर्ष की उम्र में अयोध्या लौटे | श्रीराम हमारे पूज्य या आदर्श इसलिए बन गए क्योंकि उन्होंने समाज के हित में कई मर्यादाएं स्थापित की | उन्होंने माता-पिता की आज्ञा मानी, हमेशा सत्य का साथ दिया, पर्यावरण से प्रेम किया, अनुसूचित जाति के निषाद को गले लगाया, भीलनी शबरी के जूठी बेर खाए और सभी जन-जातियों से प्रेम किया | 

    एक राजा के बतौर राज्य की प्रजा को हमेशा खुश रखा | उन्होंने एक धोबी के बचनों को भी सुना और सीता का परित्याग कर दिया | सीता और धोबी दोनों ही उनकी प्रजा थे परन्तु सीता उनकी पत्नी और प्रजा दोनों थी जबकि धोबी केवल प्रजा था | लेख के अनुसार एक धारणा है कि भारत में जाति भेद आदि काल से चला आ रहा है और तथाकथित ऊँची-नीची जातियां हमारे शास्त्रों की ही देन है  | महर्षि वाल्मीकि इस धारणा को झुठलाते लगते हैं क्योंकि वह स्वयं अनुसूचित जाती से थे और इसके बावजूद सीता उनकी पुत्री की तरह उनके आश्रम में रहीं | स्वयं राजा श्रीराम ने उन्हें वहाँ भेजा था | राज-पुत्र लव -कुश महर्षि के शिष्य थे | यहां यह दर्शाता है कि श्रीराम की मान्यता सभी वर्ग के लोगों में सामान रूप से थी | आज हम मानस का अखंड पाठ करते हैं परन्तु उसकी एक पंक्ति अपने ह्रदय में नहीं उतारते | जो उतारते हैं वे श्रद्धेय हैं | हम समाज में आज भी राम के निषाद-शबरी को गले नहीं लगाते | जो लगाते हैं वे अधिक श्रद्धेय हैं | 

     संक्षेप में श्रीराम का वास्तविक पुजारी वह है जो उनके आदर्शों पर चले | हमारी समाज में कएक रावण घूम रहे हैं और कईयों के दिलों में रावण घुसे हुए हैं |  हम उस रावण का तो पुतला जला रहे हैं जबकि इन रावणों से सहमे हुए हैं | गांधी समाधि राजघाट पर मूर्ति स्तुति में विश्वास नहीं रखने वाले बापू के मुंह से निकला अंतिम शब्द ‘हे राम’ बताता है कि वे सर्वधर्म समभाव से वशीभूत थे और ‘ईश्वर-अल्लाह’ को एक ही मानते थे | हम भी श्रीराम का निरंतर स्मरण करें और ऊँच –नीच तथा राग- द्वेष रहित समाज का निर्माण करते हुए सर्वधर्म समभाव बनाकर अपने देश में मिलजुल कर भाईचारे के साथ रहने का प्रयत्न करें | 

पूरन चन्द्र काण्डपाल


15.10.2020


 


Tuesday, 13 October 2020

Reet riwaj k thyakdaar :रीत रिवाज क थ्यकदार

खरी खरी - 712 : रीत- रिवाज क ठ्यकदार

मै -बाबू कि स्याव नि करि

बार दिन के क्वड़ करें रईं,

न्यूतपट बोलचाल न्हैति

फिर लै मुंडन करें रईं,

क्वड़ पांच-सात दिनक लै 

है सकूं पर को मानल ?

जै हुणी य बात कौला

उई गुरकि बेर आंख ताणल  ।

जसिके आठ घंट के ब्या

दिन में आदू घंट में है सकूं,

उसिके बार दिन क पिपव लै

पंछां-सतां दिन है सकूं ,

पर रीत -रिवाज क ठ्यकदार 

य बदलाव में टांग अड़ाल,

के न के नुक्त लगै बेर

आपणी मन कसि कराल ।

गौं में ब्या-काज लै

बाड़ मुश्किलल निभै रईं,

क्वे कैकि मदद निकरन

भैबेर धूं देखैं रईं,

न्यूति बलै बेर लै खाण हैं

नि ऐ दिन ऐंठी रौनी,

उनार दिलों में हमेशा

अन्यसाक किल घैटिये रौनी ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल

14.10.2020

Monday, 12 October 2020

Maya naheen mahan : नहीं महान

खरी खरी - 711 : माया नहीं महान

जग में माया नहीं महान,

फिर तू काहे करे गुमान ।

माया से प्रसाधन मिलते

मिलते नहीं संस्कार,

माया से संस्कृति मिले ना

मिल जाता बाजार,

अंत समय कछु हाथ न लागे

सभी खोखला जान । जग...

माया से तुझे मिले बिछौना

नींद न मिलने पाये,

माया से साधन मिल जाते

खुशी न मिलने पाये,

माया से तुझे मिलता मंदिर

मिले नहीं भगवान । जग...

माया से मिले भवन चौबारे

घर नहीं मिलने पाये,

दवा -आभूषण मिले माया से

मुस्कान न मिलने पाये,

माया से पोथी मिल जाए

नहीं मिल पाये ज्ञान । जग...

'यादों की कलिका से'

पूरन चन्द्र काण्डपाल

13.10.2020

Sunday, 11 October 2020

Presar horn :प्रेसर हॉर्न

खरी खरी-710 :  प्रेसर हॉर्न से दुखी हैं लोग

    शहरों में, महानगरों में या सड़क किनारे आवासों में हम सब वाहनों के प्रेसर हॉर्न से दुःखी हैं । प्रेसर हॉर्न से उपजा असह्य शोर रोगियों, बच्चों, विद्यार्थियों और वरिष्ठ नागरिकों में यह सिरदर्द, तनाव, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, अपच और तंत्रिकातंत्र के रोगों का मुख्य कारण बन गया है । वर्तमान में सड़क पर उच्च प्रेसर हॉर्न, मल्टीटोन हॉर्न, मोडिफाइड हॉर्न आदि वाहनों पर लगा कर लोग समाज की परवाह नहीं करते हुए धड़ल्ले से बजाते हुए निकल पड़ते हैं । रात्रि में हॉर्न निषेध है परन्तु ये लोग रात को भी हॉर्न बजाते हैं । इनकी हरकत पुलिस जानती-देखती है परन्तु मौन रहती है । ट्रक का हॉर्न दुपहिया वाहनों पर लगा है जो सबसे खतरनाक है ।

      एक साल पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने प्रेसर हॉर्न से उत्पन्न ध्वनि प्रदूषण पर एक याचिका की सुनवाई करते हुए दिल्ली सरकार, दिल्ली पुलिस और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को नोटिस जारी कर जबाब मांगा है । याचिका में कहा गया कि कई बार पुलिस से शिकायत करने पर भी पुलिस ने समाज को दुखी करने वाले असामाजिक तत्वों पर कोई कारवाई नहीं की ।

       जब सरकार न सुने, पुलिस न सुने और तंत्र बहरा हो जाये तो लोग न्यायालय का दरवाजा खटखटाते हैं । न्याय की गुहार लगाना भी सरकारों को न्यायपालिका का दखल नजर आता है । जनता जाए तो जाए कहाँ ? उम्मीद है न्यायालय के इस आदेश से हमारे तंत्र में कुछ चेतना आएगी । कानून की अवहेलना करने वाले आज भी खुलेआम जोर जोर से प्रेसर हॉर्न बजा रहे हैं । कुछ बाइक पर तो ट्रक या कार का हॉर्न बजाया जाता है । इनसे सख्ती से निपटा जाए ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
12.10.2020

Vyaakaran samiksha : व्याकरण समीक्षा

मीठी मीठी - 522 :  'कुमाउनी भाषाक व्याकरण '

(आजकि ( 11.10.2020 ) मीठी मीठी -522 में हल्द्वानी निवासी कुमाउनी भाषाक रचनाकार डॉ जगदीश चन्द्र पन्त ज्यू कि शब्दशः समीक्षा छ जो पंत ज्यूल मेरि किताब ' कुमाउनी भाषाक व्याकरण ' पर लेखी छ । समीक्षा साभार उद्धृत छ । )

  "आज श्री पूरन चंद्र कांडपाल ज्यूँ क किताब- कुमाउनी भाषाक व्याकरण मिल गे । यो उनरी 13 वी कुमाउनी किताब छू । हिंदी में उनुल 17 किताब लिख हाली । व्याकरणक  यो उनरी पैल किताब छू । भूमिका में डॉ हयात सिंह रावत ज्यूँ  कोंण रई कि कुमाउनी भाषा कैं सजोंण, सवारन,अघिल  बढोण, भाषा में व्याकरणक समावेश करण और नना कैं कुमाउनी सिखुण में भोत उपयोगी साबित होलि, य म्यर विश्ववास छ । व्याकरण लेखन में उन न द्वारा 22 संदर्भ ग्रंथो क सहयोग लेछ । कांडपाल ज्यूँ किताब में लगभग 32 पाठ छन । कुमाउक इतिहास, भाषा, भाषक इतिहास, कुमाउनी 10 भाषाओक चर्चा, कुमाउनी भाषाक विकास, साहित्यक इतिहास, लोक साहित्य, कुमाउनी क हिंदी दगड़ रिश्त, संस्कृत दगड़ रिश्त, टलिपि वर्तनी व्यवस्था व व्याकरण ,स्वर व्यंजन, संधि, शब्द, विकारी शब्द, संज्ञा विकारक तत्व, सर्वनाम , विशेषण, क्रिया, वाच्य, भाव , काल, अविकारी शब्द, शब्द भेद व्यवस्था, कुमाउनी शब्द संपदा, मानक वर्ण, शब्द रचना, समास ,अलंकार  ,रस और छंद, विराम चिन्ह, वाक्य रचना भेद, पद बंध और पद परिचय ,मुहावरा और लोकोक्ति ,अनुच्छेद व चिट्टी, कहानी और निबंध जास पाठ छन ।कुमाउनी व्याकरण क जानकारी देणा लिजी भली किताब छू । लेखक द्वारा भोत मेहनत करि बेर यो किताब लिखी जे राय ।"

डॉ जगदीश चन्द्र पन्त
हल्द्वानी
कुमाउनी भाषाक रचनाकार

डॉ पंत ज्यूूक हार्दिक आभार ।

पूरन चन्द्र कांडपाल
11.10.2020