Friday, 19 July 2019

Paudh ropan dhanywaad : पौध रोपण धन्यवाद

मीठी मीठी - 313 :  पौध रोपण के लिए धन्यवाद मित्रो

       मेरे लेखों -कविताओं - ट्वीट्स पर पसंदगी दिखाने वाले, सहमत होने वाले, असहमत होने वाले और टिप्पणी करने वाले सभी मित्रों का मैं हार्दिक आभार व्यक्त करता हूं । मुझे इस बात का खेद है कि मैं सभी का व्यक्तिगत- अलग से समयाभाव के कारण धन्यवाद नहीं कर सकता । मेरे लेखों में आपकी साझेदारी को में एक जनहित का पुनीत कर्तव्य समझता हूँ । वर्षा के आगमन पर इस धरती का हरित श्रृंगार जरूर कीजिए, जहां भी जगह मिले - आवास, कार्यालय, गली, मुहल्ला, पार्क, जंगल एक पेड़ तो जरूर रोपिए । वर्षा ऋतु में यह कार्य बहुत आसान है । हमें धरती का ऋण भी चुकाना है जो सिर्फ पौध रोपण से उऋण हो सकता है । आप सभी को हार्दिक धन्यवाद ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
20.07.2019

Baisi pratikriya : बैसि प्रतिक्रिया

खरी खरी - 464 : '  बैसि  पर प्रतिक्रिया

  " बैसि " बिरखांत 272 और 273 " पर सामाजिक चिंतक उजाराडी जी के उदगार -    "हमारे उत्तराखण्ड के पिछड़ने का कारण हमारी धर्मभीरुता भी है । हम सदैव अज्ञात भय से ग्रस्त रहते हैं । बचपन से बच्चों को सुनी सुनाई तिलस्मी झूठी कहानियाँ सुनाई जाती हैं । छव, झपेटा, कुणी बुढयि, मसाण, भिसौण, भूत का कल्पित भय दिखाया जाता है । हम तुम्हड़े में अनाज रखते हैं, गाय भैंस मुश्किल से एक या डेढ़ लीटर दूध देती हैं फिर भी   हाक- नजर लगने का भय रहता है । हमारे बच्चों के नाम झोली, पनियां, मुसिया, गोठिया, गोभरिया, झुपुली, जोगुली इत्यादि इत्यादि होते हैं । भय बराबर बना रहता है कहीं नजर न लग जाए। जो हम नहीं कह पाते डंगरिया रूपी देवी -  देवताओं के मार्फत कह देते हैं । हरिशंकर परसाई अपने व्यंग्य के माध्यम से कहते हैं, "देशभक्ति सीखनी हो तो देवी देवताओं से सीखो । सन 1947 में एक भी देवी देवता पाकिस्तान नहीं गये। तैंतीस करोड़ भी कम पड़ रहे हैं हमारे लिए ।"

    सभी मित्रों को अपनी टिप्पणी भेजने के लिए साभार हार्दिक धन्यवाद ।

पूरन चन्द्र कांडपाल
19.07.3019

Thursday, 18 July 2019

Baisi mein lhe badyal : बैसि में लहे बद्यल

बिरखांत -273 : बैसि में ल्हे बद्यल

(ये है पैल बिरखांत -272, 11.07.2019 संदर्भ, उत्तराखंड में बैसि )

       बैसिक बार में एक दुसर गौं कि एक दुसरी कहानि छ | यां बैसि देखूं हूँ रोजाना द्वि ज्वान लौंड, हरकू- खड़कू औंछीं | यूं आपस में एक दुसरै कि जलंग करछी और एक दुसरै कैं निच्च देखूण कि ताक में रौंछी | इग्यारी ( बैसि क 11 ऊं रात  ) हुणि खड़कू धुणी में नाचि गो | वीक नाचण देखि हरकू लै ताव में ऐ बेर बदन हल्कों फैगो | खड़कूवैल हरकू उज्यां आँख ताणी और हरकू लै नाचण फैगो | खड़कू नाचन- नाचनै हरकूवैक नजीक गो और उकें द्वि मुक्क ज्येड़ि दीं | हरकू कैं लै गुस्स आ और वील खड़कू कैं मुक्क मारण चा | यतु में दासल जोरल आवाज लगै दी, “होश से, बिना गुरु अन्यार रात किलै है रै ?”  यतुमें हरकूवैल खड़कू कैं छोड़ि दे | 

     दुसार दिन बैसि कि जागर में हरकू धोति पैरि बेर घरै बै नाचणक मूड में आछ | उकें धुणी में खड़कू नजर नि आय | जब खड़कू कैं पत् चलौ कि हरकू धोति पैरि बेर ऐ रौ, उ लै फटाफट धोति पैरि बेर चढ़मड़ानै धुणी में पुजि गो | जस्सै दासल ढोल में पट्टाक मारौ,  हरकू जोरैल नाचौ और उपन जस तिड़ी बेर खड़कू पर झपटि पड़ौ | द्विनू कि गुर्दाफानी कैं बैसिक मुंड लै चाइए रै गाय और उनर दयाप्त लै घेरी गोय | खड़कू- हरकू लड़न–लड़नै धुणी है भ्यार न्है गाय | दासल गाव में बै ढोल निकाइ  दे | कतु झणीयांल उनुकें अछुड़ा पर आखिर में पटवारी बलूण पड़ौ | आदू रात कै पटवारी क सामणी पंचनाम करि बेर केश रफादफा करौ | बाईस दिन बाद भनार हौछ पर हरकू–खड़कूवक मनमुटाव ख़तम नि हौय और आज तक लै मुखबलौ न्हैति | आब यूं नाचण लै भुलि गईं | झाणी कथां गो उनर दयाप्त घ्वड़ कैं छोड़ि बेर |

     बैसि करी डंगरियाँ कि मांग यां ज्यादै छ | सौ में एकाद कैं छोड़ि बेर सब डंगरिय शिकार, शराब, बीड़ी, सिगरट, तमाकु, खैनी, अत्तर, गांज आदिक सेवन करनी | इनर आचार, विचार और व्यवहार लै रुढ़िवाद और संकीर्णताल भरी हुंछ | लोगों कैं इनर यूं चीजोंक सेवन करण में नक् लै नि लागन और न यैकैं यूं ऐब मानन | पहाड़ बै नौकरी कि ढूंढ में भ्यार आई लोग जब लै पहाड़ जानी, इनार यूं हरकतों देखि चुप रौनी | क्वे लै गिच नि खोलन | बुरि चीज हूं बुरि छ कूण कि हिम्मत वां जाते ही लापता है जींछ |

      काश ! हमार देवभूमिक लोगों कैं य बात समझ ऐ जानि कि य बैसि, जागर, डंगरी, दास, भूत, मसाण हमार दिमाग में छाई अन्यार कि उपज छ, तो लोगों क अन्धविश्वास है बेर पिंड छुटि जान | यांक स्यैणी विरोधक नाम पर गिच लै नि खोलि सकन | पढी- लेखी स्यैणी लै चुप रौनी | जब सबूंल चुपै रौण सिखि हैछ त देवभूमिक भल कसिक है सकूं ? अन्धविश्वासक अन्यार कैं भजाउण क लिजी एक नै एक  दिन त एक छिलुक जगूण पड़ल | कुवक मिनुक बनि बेर ज्यौन राण हैबेर बेबखत कि मौत भलि छ | 

     बैसि क बार में मंथन जरूरी छ | म्यर विचार पर जो सहमत न्हैति ऊँ नक झन मानिया | शराबि दास-डंगरियोंक अणगणत किस्स राज्य में फुफै रईं | हमूल राम ज्यू और कृष्ण ज्यूक दिखाई बाट छोडि बेर आपूं कैं अन्धविश्वास कि स्येलि पर बादि रौछ | हाम छन अखां काण बनि गोयूं | म्यार बात पर विश्वास करण कि लै जरवत न्हैति | खुद परखिया, देखिया पै आपण जज आफी बनि बेर सही  फैसाल करिया | साधुवाद | जयहिन्द ।


 पूरन चन्द्र काण्डपाल

19.07.2019


Wednesday, 17 July 2019

Chandr grahan kyon : चन्द्र ग्रहण क्यों ?

मीठी मीठी - 311 : चन्द्र ग्रहण क्यों ?

      मेरे परम मित्र और मार्गदर्शक आदरणीय वाई पी नैनवाल जी का चन्द्र ग्रहण के बारे में सोसल मीडिया से एक लघु लेख यहां उद्धृत है । चन्द्र ग्रहण 16 और 17 जुलाई 2019 की दरम्यानी रात को हुआ था । कुछ मित्रों ने इस खगोलीय घटना पर " सूतक" मनाया और कुछ ने पौधरोपण कर धरती का हरित श्रंगार किया । हम विज्ञान के युग में विज्ञान प्रदत वस्तुओं का खूब आनंद ले रहे हैं परन्तु रूढ़िवादिता में हम सदियों पुराने ढर्रे पर चलने की बात करते हैं । सोच आपकी, मर्जी आपकी । चन्द्र ग्रहण को तो जान ही लीजिए ।
      
   नैनवाल साहब बताते हैं, " हर चन्द्र ग्रहण पूर्णिमा को पड़ता है और सूर्य ग्रहण अमावस्या को पड़ता है। विदित हो कि पिछली अमावस्या को सूर्य ग्रहण था। चन्द्र ग्रहण तब होता है जब सूर्य और चंद्रमा के बीच पृथ्वी आ जाती है और सूर्य ग्रहण तब होता है जब सूर्य और पृथ्वी के बीच चंद्रमा आ जाता है ।

     चन्द्रमा की चौसठ कलाएं हैं। चन्द्रमा किसी निश्चित पथ पर नहीं घूमता है। चन्द्रमा अपनी परिधि पर 27 दिन 7 घण्टे 43 मिनट 11 सेकंड में पूरी करता है और पृथ्वी की परिक्रमा भी इतने ही समय में पूरी करता है, इसलिए तुम्हे चन्द्रमा का एक ही हिस्सा दिखाई देता है।

      तुम देखोगे की आजकल सूर्य उत्तर कर्क रेखा से वापिस भूमध्य रेखा की ओर चल रहा है। सूर्य नहीं चल रहा है लेकिन पृथ्वी झुकी होने के कारण यह स्थिति पैदा हुई है। इसीलिए चन्द्रमा जब पृथ्वी से अधिक दूर होता है तो उसे अपोगी (apogee) कहते हैं और जब चन्द्रमा पृथ्वी से बहुत निकट होता तो उसे  पेरिगी (perigee ) कहते हैं।

      ये ग्रहण एक ही जगह हमेशा नहीँ होते हैं।उसका कारण है कि चन्द्रमा का एक पथ पर नहीं चलना। पृथ्वी अपनी धूरी पर 23 घण्टे, 56 मिनट, 4.1सेकंड में पूरी करती है और सूर्य की परिक्रमा 365 दिन, 6 घण्टे , 9 मिनट 9.76 सेकंड में पूरी करता है। सौर सिद्धान्त में 360 दिन का एक वर्ष होता है और अंग्रेजी में 365 दिन 6 घण्टे 9 मिनट 9.76 सेकंड का होता है। इसी अंतर के कारण अधिमास होता है।"

        इसके अलावा और अधिक जानकारी चाहने वाले  जिज्ञासु कृपया नैनवाल साहब से संपर्क कर सकते  हैं, fb पर इसी नाम से उपलब्ध हैं । अतः किसी भी ग्रहण का वैज्ञानिक दृष्टिकोण समझा जाय और सूतक की बात न कहीं जाय । बाकी किसी की मर्जी । धन्यवाद ।

पूरन चन्द्र कांडपाल
18.07.2019

Tuesday, 16 July 2019

Paudh parv harela : पर्व हरेला

मीठी मीठी - 310 : पौध पर्व,  हरेला मनाया

हमने पौध रोप कर हरेला मनाया,
चन्द्र ग्रहण का सूतक नहीं मनाया,
धरती का हरित श्रृंगार किया
मुस्कराई धरती मन हर्षाया ।

( हरेला पर्व की सबको शुभकामनाएं ।)

पूरन चन्द्र कांडपाल
17.07.2019,
हरेला पर्व, पौध पर्व

Harayaav ki badhai : हरयाव कि बधै

मीठी मीठी - 309 : हरयाव कि बधै

हरयाव कि बधै ।
हरयाव कि शुभकामना ।
जी रया जागिे रया,
गणतु पुछयारि है बचि रया,
बकर बलि है बचि रया,
डंगरियों है बचि रया,
जगरियों है बचि रया,
शराब है बचि रया,
बीड़ी सिगरट है बचि रया,
गुटक तमाकु है बचि रया ,
अंधविश्वास है बचि रया,
झुटि पाखंड है बचि रया,
कर्म संस्कृति कैं अपनया,
आपण काम में जुटि रया,
एक डाव बोट जरूर लगाया,
हरयाव कि खूब खूब बधै,
हरयाव कि भौत भौत शुभकामना ।

पूरन चन्द्र कांडपाल
17.07.2019

Kekado par prtikriya : केकड़ों पर प्रतिक्रिया

खरी खरी - 463 :   गिगाजों (केकड़ों ) पर प्रतिक्रिया

    14 जुलाई 2019 के ट्वीट (T670)  "महाराष्ट्र में तिवारा बांध के केकड़ों को नमन जिन्होंने सरकार को जवाबदेही और ठेकेदार को भ्रष्टाचार से बचा कर जुर्म गले लगाया। " पर मित्र उजराडी जी ने बहुत सटीक प्रतिक्रिया दी है जिसे आज की खरी खरी में साभार उद्धृत किया जा रहा है ।

     उजराडी जी की प्रतिक्रिया - " पक्षी हमारे देश में अपना पाशविक धर्म निभा रहे हैं । बंदरों ने कई सरकारी आफिसों में सारी बलाएँ अपने ऊपर ली हैं । पंखे, ट्यूब लाइट, सरकारी कागजात खराब करने का जिम्मा अपने सर ले लिया है । चूहे थानों में ज़ब्त शराब पी रहे हैं और अनाज गोदामों में करोड़ों लोगों का राशन चट कर रहे हैं । दीमक ने थानों में जब्त नशीले पदार्थों को मिट्टी बना दिया है । आवारा कुत्तों ने कागजों में हुई नशबंदी का सेहरा अपने सर बांध लिया है । हस्पतालों में कुत्ते व बंदरों के काटे एंटी रैबीज इंजेक्शनों की खरीद व खपत ने कइयों की पौ- बारह कर रखी है । आया चाहती है कि बच्चा बच्चा ही रहे अन्यथा बच्चे के बड़े होने पर उसकी छुट्टी हो जाएगी । आवारा गायों व गोवंशों के कागजों में चल रहे संरक्षण व पोषण की कालिख को सफेद कर दिया है । गोरैया संरक्षण, बाघ बचाओ नये नये बचाव कार्य चल रहे हैं । गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है, समरथ को नहिं दोष गुसाईं ।  चुनावी रेवड़ियां बंट रही हैं । वोटों की फसल लहलहा रही है । लोकतंत्र हांफ रहा है । "

      महाराष्ट्र के तिवारा बांध के केकड़ों द्वारा  कुरेदे जाने /तोड़े जाने की बात पर एक व्यंग्य समाचार पत्र में छपा था । अर्थात तंत्र ने सारा दोष केकड़ों पर मड़ दिया गया और सभी जिम्मेदार लोग बखूबी बच गए । आज देश में कोई पुल टूटे, बांध या नहर टूटे, सड़क टूटे, सरकारी इमारत टूटे, जंगल में आग लगे, गोसाला में गोवंश मरे, अस्पताल में बच्चे बेमौत मरे,  इस सब के लिए तंत्र को कभी भी दोषी नहीं ठहराया जाता बल्कि तंत्र या जिम्मेदार लोगों को बचा कर दोष केकड़ों या कुदरत या अज्ञात कारणों को दे दिया जाता है । मेरा देश महान ।

पूरन चन्द्र कांडपाल
16.07.2019