Tuesday, 16 April 2019

Mahavir jayanti : महावीर जयंती

मीठी मीठी - 262 : आज महावीर जयंती

     महावीर जयंती जैन समुदाय का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। महावीर स्वामी जैन धर्म के 24वें तीर्थकर थे। कई जगह महावीर जयंती को महावीर स्‍वामी जन्‍म कल्‍याणक भी कहा जाता है । भगवान महावीर के बारे में लिखा गया लघु लेख मेरी पुस्तक "लगुल" से यहां उधृत है । सभी मित्रों को इस पावन पर्व की शुभकामना ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
17.04.2019

Monday, 15 April 2019

U bhoot ni chhi : उ भूत नि छि

खरी खरी - 415 : उ भूत नि छी
('वह भूत नहीं था' सच्ची कहानी का कुमाउनी रूपांतर )

      वर्ष 1995 में म्यर पैलउपन्यास  ‘जागर’ हिंदी अकादमी दिल्ली क सौजन्य ल प्रकाशित हौछ जो बाद में ‘प्यारा उत्तराखंड’ अखबार में किस्तवार छपौ लै | जैल लै य देखौ वील यकैं भल बता | एक दिन महानगर दिल्ली में रत्ते पर उपन्यास क एक पाठक रेशम म्यार पास ऐ बेर बला, “कका आज दिन में तीन बजी हमार घर भूत कि जागर छ, म्येरि घरवाइ पर भूत नाचें रौ  | एक कम्रक मकान छ, बैठणक लिजी जागि न्हैति ये वजैल केवल आपूं कैं और एकाध सयाण झणी कैं बलूं रयूं | डंगरि आल, दास नि अवा | डंगरि बिना ढोल- हुड़क कै हात –पात जोड़ि बेर नाचि जांछ | आपूं जरूर अया |” तीन वर्ष पैली रेशमक ब्या हौछ | पांच लोगोंक य परिवार में इज- बौज्यू, एक भै, रेशम और वीकि घरवाइ छी | परिवार एक भौ लिजी लै तरसि रौछी |

       मि ठीक तीन बजे वां पुजि गोय | वां यूं पाँचोंक अलावा पड़ोसक द्वि जोड़ि दम्पति और डंगरिय मौजूद छी | धूप-दीप जगै बेर, डंगरिय कैं दुलैंच में बैठा और रेशमक बौज्यू जोड़ी हाथों कैं मुनाव पर टेकि बेर गिड़गिड़ाने कौं राय, “हे ईश्वर- नरैण, य म्यार घर में कसि हलचल हैगे ? को छ य जो म्येरि ब्वारि पर लैरौ | गलती हैगे छ त मिकैं डंड दे भगवन, यैक पिंड छोड़ |” डंगरिय कापण फैगोय और ब्वारि लै हिचकौल –हिनौल खेलें फैगेइ | ब्वारिक उज्यां चै बेर रेशमक बौज्यू जोरल बलाय, “हम सात हाथ लाचार छ्यूं, तू जो लै छै येकैं छोड़, मिकैं पकड़, मिकैं खा |” ऊँ डंगरियक उज्यां चानै बलाय, “तू देव छै, द्यखा आपणि करामात |” य बीच ब्वारि भैटी- भैटिये ख्वारक खोली बाव हलूनै डंगरियक तरफ सरकि गेइ | डंगरियल जसै उकैं बभूत लगूण चा उ बेकाबू घोड़िक चार बिदकि गेइ, यस लागें रय कि उ डंगरिय पर झपट पड़लि | डंगरिय डरनै बचाव मुद्रा में ऐ बेर म्ये उज्यां चां फै गोय  |

      य दृश्य देखि सब दंग रै गाय | रेशम म्येरि तरफ देखि बेर बलाय, “य त हद हैगे | यैक क्वे गुरु गोविन्द नि रय | यस डंगरिय नि मिल जो ये पर साव सेर पड़ो | परिवार कि परेशानी देखि म्यार मन में एक विचार आ और मि उठि बेर भ्यार जाणी द्वारक नजीक भैटि गोय | मील गंभीर मुखड़ बनूनै जोरल कौ, “बिना गुरुकि अन्यारि रात नि हुण चैनि ! बता तू कोछै ? को गाड़- गध्यार बै ऐ रौछे ? खोल आपण गिच | आदि-आदि..” म्येरि भाव- भंगिमा और बोल सुणि बेर सबै समझें फैगाय कि मि उ डंगरिय है ठुल डंगरिय छ्यूं | म्यार उज्यां चै बेर रेशम क बौज्यू बलाय, “परमेसरा बाट बते दे, म्यर इष्ट –बदरनाथ बनि जा |” मील उनुकैं इशारल चुप करा |

     मि रेशमकि घरावाइक उज्यां चै बेर बलायूं, “तू बलाण क्यलै नि रयै ? नि बलालै मि बुलवे बेर छोडुल | मसाण- भूतक इलाज छ म्यार पास |” उ नि बलाइ | मील रेशम उज्यां चै बेर जोरल कौ, “धुणि हाजिर कर दे सौंकार |”  रेशम-  “परमेसरा यां धुणि कां बै ल्यूं ?”  मि - “धुणि न्हैति तो स्टोव हाजिर कर दे |” रेशम तुरंत रस्या बै स्टोव, पिन और माचिस ल्ही बेर आ | म्यार इशार पर वील स्टोव जला | मि - “चिमट हाजिर कर दे सौंकार |” उ भाजि बेर गो और रस्या बै चिमट ल्ही आ | सबै समझें रौछी कि म्ये में द्याप्त औंतरी गो पर य बात निछी | डरल म्येरि हाव साफ़ है रैछी | मील ठान रैछी, अगर रेशम कि घरवाइ म्ये पर झपटली तो मि द्वार खोलि बेर भ्यार कुतिकि जूल |

      मील स्टोवक लपटों में चिमट लाल करनै रेशम कि घरवाइ उज्यां चै बेर कौ, “जो लै भूत, प्रेत, पिसाच, मसाण, छल, झपट तू य पार लै रौछे, अगर त्ये में हिम्मत छ तो पकड़ य लाल चिमट कैं, नतर मि खुद य चिमट कैं त्यार गिच में टेकि द्युल |” मी उकैं डरूणक लिजी कौं रौछी | लाल चिमट देखि रेशम कि घरवाइक हिलण बंद है गोय और उ ख्वार में साड़ी पल्लू धरनै सानी कै उतै बै पिछाड़ि खसिकि गेइ | आब मी बेडर है बेर जोरल बलाय, “जो लै तू य पर लै रौछिये आज त्वील य धुणि –चिमटक सामणि येक पिंड छोड़ि है | आज बै येक रुमन- झुमन, रुण –चिल्लाण, चित्त-परेशानी, शारीरिक- मानसिक क्लेश, रोग -व्यथा सब दूर हुण चैनी |” यतू कै बेर मील स्टोव कि हाव निकाल दी |

      जागर ख़तम है गेछी | उ डंगरियल मिकैं आपू है ठुल डंगरी समझि मुनव झुकै बेर म्यार उज्यां चानै हात जोड़नै कौ, “धन्य हो महाराज |” रेशम आपणि घरवाइ कैं अघिल ल्या और मिहूं बै उकैं बभूत लगवा | बभूत लगूनै मील उहैं कौ, “आज बै तू निरोग छै, निश्चिंत छै और बेडर छै | खुशि रौ, आपू कैं व्यस्त धर, कुछ पढ़ –लिख, खालि नि रौ और एक परमात्मा में विश्वास धर | भूत एक भैम छ,  कल्पना छ | खालि भैटि बेर बेकाराक, उल-जलूल विचार मन में पनपनी | येकै वजैल खालि दिमाग भूतक घर कई जांछ | जिन्दगीक एक मन्त्र छ कि कर्म करते रौ, व्यस्त रौ और भगवान में विश्वास धरो | यतू कै बेर मि चड़क उठूं और नसि आयूं  |

      य क्वे सोची समझी योजना नि छी | सबकुछ अचानक हौछ | कएक लोग मिकैं भूत साधक समझण फै गाय | भूत हय नै, साधुल कैकैं ? य एक भैम -रोग छ जो यौन वर्जना, डर, फिकर, आक्रामक इच्छाओं कि पुर नि हुणल  कुंठाग्रस्त बनै द्युछ और दबाव देखूण पर भावावेश में य रूप प्रकट है जांछ  | मनखी है क्वे ठुल भूत नि हुन | आज क्वे यसि जागि न्हैति जां मनखी नि पुजि रय | रेशम कि कहानि हमूकैं य बतै छ कि वीकि घरवाइ पर क्वे भूत नि छी | अंधविश्वास कि सुणी- सुणाई बातोंक घ्यर में उ कुंठित है गेछी | अघिल साल उनार घर एक भौ जन्म है गोछी | हमुकैं फल कि इच्छा नि करण चैनि और कर्म रूपी पुज में व्यस्त रौण चैंछ | अंधविश्वासक अन्यार कर्मयोगक उज्यावक सामणि कभै लै नि टिकि सकन | ( य सांचि कहानि म्येरि किताब ‘उत्तराखंड एक दर्पण -2007’ क आधार पर उधृत ।)

पूरन चन्द्र काण्डपाल
16.04.2019

Sunday, 14 April 2019

Andhshraddha : अंधश्रद्धा

खरी खरी - 414 : अंधश्रद्धा को समझना होगा

      अंधविश्वासियों ने बनारस को क्योटो नहीं बनने दिया और न बनने देंगे । उन्होंने तो कहा था, "मुझे गंगा ने बुलाया है और मैं काशी को क्योटो बनाऊंगा।"  गंगा वैसी की वैसी क्योंकि हम नहीं बदले । कहा जाता है कि एक अरसे पहले कई घंटों की पूजा-  आरती देख सिंजो आबे भी कह गये कि आपके पास इस तरह बरबाद करने के लिए बहुत समय है । आज भी गंगा सहित देश की नदियों में गंदे नाले तो मिल ही रहे गेन, अंधश्रद्धा से वशीभूत लोग  दूध बहा रहे हैं और जमकर धार्मिक विसर्जन कर रहे हैं । काश !  यह दूध नदियों और मूर्तियों में बहने के बजाय किसी कुपोषित बच्चे के मुंह में जाता तो देश से कुपोषण दूर होता और देश का IMR (शिशु मृत्यु दर) कम होती । भारतमाता को अंधविश्वास से मुक्त करो दोस्तो, तभी हम विश्वगुरु बनेंगे । वैज्ञानिक दृष्टिकोण को नजरअंदाज कर अंधश्रद्धा को पोषने के कारण  विश्व के 500 शीर्ष विश्वविद्यालयों में भारत का एक भी विश्वविद्यालय नहीं है ।

     हमारा देश अंधविश्वास के मकड़जाल में फंसा हुआ है । जहां देखो अंधविश्वास का बोलबाला है । टेलीविजन के सैकड़ों चैनलों में प्रतिदिन अंधविश्वास परोसा जाता है जिसके कारण वैज्ञानिक दृष्टिकोण को धक्का लगता है । समाज को आज भी शनि- राहु - केतु की डोर से उलझाये रखा गया है । हमें ऐसे तथाकथित गुरु - चेलों से बचना है जो सत्य स्वीकारने को तैयार  नहीं हैं । कहते हैं :-

जाका गुरु भी अन्धत्वा
चेला निरा निरंध,
अंध ही अंधा ठेलिया
दोऊं कूप पड़न्त ।

    अंधश्रद्धा से वशीभूत लोग भारतमाता को कहां ले जाना चाहते हैं यह हमने सोचना है । भगवान तो प्रतीक के बतौर केवल एक बूंद दूध- जल की श्रद्धा से सन्तुष्ट हो जाते हैं फिर यह मूर्ति के ऊपर से होता हुआ दूध नाली में क्यों बह रहा है ? मंथन करेंगे तो उत्तर अवश्य मिलेगा । आपके द्वारा किसी कुपोषित बच्चे को दिया गया दूध हमारे देश को ताकत देगा और भारत का IMR सुधरेगा ।  जयहिन्द ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
15.04.2019

BR Ambedkar : बीआर अंबेडकर

मीठी मीठी - 260 भारत रत्न डा. बी आर अम्बेडकर का स्मरण

(बैशाखी पर्व की शुभकामनाओं सहित)

         मेरी पुस्तक ‘महामनखी’ में 8 नोबेल पुरस्कृत, 21 परमवीर चक्र,  66 अशोक चक्र विजेताओं के साथ 45 भारत रत्नों की भी लघु चर्चा है | भारत रत्न क्रम 22 में बाबा साहेब के बारे में निम्न शब्द उद्धृत हैं –

      डा. भीमराव रामजी अम्बेडकर (बाबा साहेब) का जन्म महू, मध्य प्रदेश में 14 अप्रैल 1891 को एक दलित परिवार में हुआ | उनकी पिता का नाम रामजी मालोजी और माता का नाम भीमाबाई था | वे अपने माता- पिता की चौदहवीं एवं सबसे छोटी संतान थे | 16 वर्ष की उम्र में रमाबाई से उनका विवाह हुआ | उनकी शिक्षा मुंबई विश्वविद्यालय, कोलंबिया विश्वविद्यालय, लन्दन विश्वविद्यालय और लन्दन स्कूल आफ इकोनोमिक्स में हुयी |

     बाबा साहेब एक अच्छे प्रवक्ता, अर्थशास्त्री, वकील, समाज सुधारक और राजनीतिज्ञ थे | उन्होंने दलितों. महिलाओं एवं मजदूरों के साथ होने वाले सामाजिक भेदभाव का जमकर विरोध किया | उन्होंने छुआछूत और अन्धविश्वास के विरोध में भी आवाज उठायी | वे नेहरू कैबीनेट में देश के प्रथम क़ानून मंत्री थे | वे संविधान निर्माण समिति के अध्यक्ष भी थे | उन्होंने 1948 में डा. शारदा कबीर से दूसरी शादी की | 14 अक्टूबर 1956 को उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाया | 6 दिसंबर 1956 को 65 वर्ष की उम्र में उनका देहावसान हो गया  | वर्ष 1990 में उन्हें मरणोपरांत देश का सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ प्रदान किया गया |

     आज डा. अम्बेडकर जी के नाम पर अनचाही राजनीति हो रही है । उन्हें वोट बैंक के बतौर प्रयोग किया जा रहा है । कहीं पर उनकी प्रतिमा खंडित हो रही है तो कहीं उस पर मनचाहा रंग चढ़ाया जा रहा है ।  उच्च पदों पर विराजमान सभी नेताओं को बाबा साहेब की भावना के अनुसार देश के सौहार्द को मजबूती से बनाये रखने के प्रयत्न करने चाहिए तथा इस सौहार्द को जख्म देने वालों को दंडित किया जाना चाहिए ।  सभी से निवेदन है कि नफरत की आग से भारतमाता को मत झुलसाइये । इस बीच हमने आंदोलनों में जो अराजकता देखी उससे देश को अपूरणीय क्षति हुई  । नफरत पनपाने से देश का भला नहीं होगा । हमारी इन्द्रधनुषी संस्कृति और सौहार्द के रंगों को बदरंग करने वालों से हमें सावधान रहना पड़ेगा । बाबासाहेब को विनम्र श्रद्धांजलि के साथ सभी को बैशाखी पर्व की शुभकामनाएं ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
14.04.2019

Hamare Ram : हमारे राम

खरी खरी - 413 : रामनवमी पर हमारे राम

    इस वर्ष महाष्टमी और नवमी पूजा 13 अप्रैल 2019 शनिवार को मनाई जा रही है क्योंकि 13 अप्रैल को सुबह 08:16 बजे के बाद ही नवमी तिथि लगने की बात कही जारही है जो 14 अप्रैल की सुबह 6 बजे तक ही विद्यमान रहेगी ।

    आज रामजी के बारे में बहुत बड़े लेख की जरूरत नहीं है क्योंकि राम के बारे में हम सब जानते हैं, प्रतिवर्ष रामलीला भी देखते हैं, सुन्दर कांड का पाठ भी करते-सुनते हैं और यदाकदा राम कथा भी सुनते हैं । राम के बारे में जानते तो हैं परन्तु उनके बताए मार्ग पर नहीं चलते । राम की तरह हम निषाद- सबरी को गले नहीं लगाते । हम पर्यावरण पर भी ध्यान नहीं दे रहे और न हमें उस राम-राज्य की चिंता है जिस में सामाजिक न्याय और सामाजिक सौहार्द को प्रमुखता दी जाती थी । राम- भक्त हनुमान जी की तरह हम में सेवा -भाव भी नहीं है । हो सके तो इस पर विनम्रता से मंथन करें क्योंकि राम जी संयम, विनय, सामंजस्य, सौहार्द, मर्यादा, शिष्टाचार तथा कर्म के प्रतीक हैं  । यह गीत भी हमें यही शिक्षा दे रहा है -

'देखो वो दिवानों
तुम ये काम न करो,
राम का नाम
बदनाम न करो ।'

     समाज और देश के लिए कुछ अच्छा काम करके आज अपने राम को रिझाने का पवित्र अवसर है । आइये अपने राम को रिझायें ।  रामनवमी की सभी मित्रों को हार्दिक शुभकामना ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
13.04.2019

Thursday, 11 April 2019

Baaj teerandaaj : बाज और तीरंदाज

खरी खरी - 412 : बाज और तीरंदाज

    देश के लगभग सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में महिलाओं पर दुराचार घटने का नाम नहीं ले रहे । दुराचारी क़ानून से बेखौप हैं । सम्पूर्ण मीडिया हर रोज महिला अपमान, दुष्कर्म, पड़ताड़ाना, चेन स्नैचिंग, छेड़छाड़ और महिला हत्या के समाचारों से भरा रहता है । राज्यों में किसी भी दल की सरकार हो, महिला सुरक्षा सब जगह खतरे में है । ऐसा क्यों हो रहा है ?  कैसे और कब थमेगा यह सामाजिक कलंक ? बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा तो लगा, ढिंढोरा भी पिटा परन्तु दुष्कर्म और हत्या जैसे जघन्य महिला अपराध बढ़ते गए ।

      वर्ष 2012 के घृणित निर्भया कांड के दोषियों को अभी तक सजा नहीं मिली है । उन्नाव और कठुआ सहित देश की कई अन्य भागों में जघन्य महिला अपराध से देश एक व्यथित है । राजनैतिक संरक्षण से असामाजिक तत्व गुलजार हैं । इस दौर से डरी - सहमी महिला की व्यथा-वेदना और सिसकियों से हमारी संवेदना पिघलती क्यों नहीं ? कई बार यह चर्चा में आ चुका है कि हमारा देश महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं है । महिलाओं की इस व्यथा से सभ्य समाज तब अधिक व्यथित होता है जब महिलाएं पूछतीं हैं -

'चीं चीं करती चिड़िया पूछे
कहां जाऊं मैं आज ?
ऊपर पसरा बाज का पंजा
नीचे घूरे तीरंदाज ।'

पूरन चन्द्र काण्डपाल
12.04.2019

Wednesday, 10 April 2019

Jio aur jiwan do : जीओ और जीवन दो

मीठी मीठी - 259 : जीओ और जीवन दो

     कल 10 अप्रैल 2019 को प्रातः पौने छै बजे भारतीय योग संस्थान (प.) के साधना केंद्र न.2, अवंतिका जिला पार्क सेक्टर 1, रोहिणी दिल्ली में आयोजित 53वें स्थापना दिवस समारोह में सम्मिलित होने का अवसर मुझे  केंद्र प्रमुख श्रीमती सरोज एवं श्री चन्द्र प्रकाश जोशी जी द्वारा दिया गया । इस आयोजन में श्री तारा दत्त पांडे जी की भूमिका मुख्य सूत्रधार (संचालन) की रही ।

       योगाभ्यास का कार्यक्रम दीप प्रज्ज्वलन के साथ ही सरस्वती वंदना से आरंभ हुआ । निर्धारित योगासनों के समापन के पश्चात मुझे भी कुछ शब्द कहने का अवसर प्राप्त हुआ । इस आयोजन में स्वास्थ्य शिक्षा के कुछ विषयों को छूने का प्रयास किया । वर्तमान जीवन शैली,  समय का अनुपालन, जीवन में अनुशासन, मधुमेह, मोटापा, तनाव, अनिंद्रा,  रक्तचाप, भोजन, स्वच्छता सहित कई विषयों की चर्चा हुई । सभी साधकों ने इस अवसर का लाभ उठाया और सामाजिक बुराइयों को दूर करने एवं स्वच्छता अपनाने का संकल्प लिया ।

       मैं भारतीय योग संस्थान के इस जनोपयोगी कार्यक्रम " जीओ और जीवन दो" के सिद्धान्त से बहुत अभिभूत हुआ । कार्यदिवस (बुधवार) होने के बावजूद कार्यक्रम में बहुत लोगों की भागीदारी देखने को मिली । हमें अपने जीवन में योग साधना को अपनाना अतिआवश्यक है । 'स्वास्थ्य जागरूकता' और 'भोजन अनुशासन' के संकल्प से हम सदैव निरोग एवं स्वस्थ रह सकते हैं । सभी योग साधकों को 53वें स्थापना दिवस की बहुत- बहुत शुभकामनाएं ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
11.04.2019