Saturday, 19 January 2019

Pyaaral samajhau nanaa kain : प्यारल समझौ नना कैं

खरी खरी - 374 : प्यारल समझौ नना कैं

    बेई चनरदा मिलीं और अच्यालाक ननाक बार में कुछ ज्यादै चिंता में डुबि रौछी | बतूण लागीं, “ के कई जो हो महाराज हम आपण नना देखि डरै फै गोयूं और डरा मारि हमूल नना हैं के लै कौण छोड़ि हालौ | हर दुसार दिन खबर मिलीं या टी वी में हम देखनूं कि इज या बौज्यूकि डांट पड़ण पर फलाण नान घर बै भाजि गो या फंद पर लटकि गो | य डराक वजैल हमूल लै नना हैं के कौण छोडि है जो भलि बात न्हैति | हमूल नना कैं टैम दीण चैंछ | प्यारल समझै बेर लै नान मानि जानी  पर य काम बिलकुल नानछिना यानै शैशव काल बै शुरू हुण चैंछ | जता लै हमू कैं नना में क्वे लै अवगुण नजर ओ, हमूल धृतराष्ट्र या गांधारी नि बनण चैन | दुर्योधनाक अवगुणों कैं वीक इज- बौज्यूल देखीयक अणदेखी करि दे | उनूल गुरु द्रोणाचार्यकि बात कैं लै अणसुणी करि दे |

        जब लै क्वे हमूं हैं हमार नना कि बुराई करनी हमूल नक् मानणक बजाय चुपचाप विकि बात कैं जाचण –परखण चैंछ | कम उमराक नान लै हमार दिई मोबाइल या कंप्यूटर पर उत्तेजनात्मक दृश्य देखें रईं | देश में 13 साल है कम उम्र क 76 % नान रोज यू ट्यूब में वीडियो देखें रईं जनूल आपण अभिभावकों कि इजाजत ल आपण एकाउंट बनै रौछ | ननाकि भाषा लै गन्दी या अशिष्ट है गे | ऊँ आपण आम-बुबू कैं लै के नि समझन और नै उनरि सुणन | उनू कैं घर का खाण लै भल नि लागन | ऊँ चाउमिन, मोमोज, बर्गर, चिप्स, फिंगर फ्राई और बोतल बंद पेयल म्वाट लै हूं फैगीं या उनरि तंदुरुस्ती बिगड़ण फैगे |  घर में लै हाम नना पर के खाश अनुशासन नि लगून और उनुकें ज्यादै पुतपुतै दिनू | रतै उठण बटि रात स्येतण तक नना लिजी टैमक कैद-क़ानून हुण चैंछ | खेल और टी वी पर एक-एक घंट है ज्यादै टैम दींण ठीक न्हैति | 15 अगस्त या 26 जनवरी कि छुट्टी देर तक स्येतणक लिजी नि हुनि  बल्कि जल्दि उठि बेर य दिन कैं मनूणक लिजी हिंछ |

        कुछ लोग आपण अवयस्क लाडलों कैं स्कूटर, मोटरसाइकिल या कार चलूणकि खुलि छूट दीं रईं |  गली-मुहल्ल में अक्सर यौ दृश्य हाम देखैं रयूं | अवयस्क लाड़िल आपण वाहन ल नजीक में खेलणी नना कैं कुचलि द्युछ | कैकै निर्दोष नान मारी गाय और य लाड़िल कैं सजा लै नि हुनि क्यलै कि उ अवयस्क मानी जांछ | रात में यूं जोर जोरैल हॉर्न बजै बैर लोगों कैं परेशान करि बेर उड़नछू है जानी | पुलिस सब चैरीं पर चुप भैटी रैंछ | यास ननाक अभिभावकोंक लेसंस रद्द हुण चैंछ | हालकि रिपोटक अनुसार सड़क दुर्घटनाओं में हमार देश में हर साल डेड़ लाख बेक़सूर लोग मारी जानी और तीन लाख लोग घैल है जानी | य संख्या में अवयस्क लाडलों द्वारा मारी गईं निर्दोष लोग लै शामिल छीं |

      नना दगै देशप्रेम और शहीदोंकि चर्चा लै हुण चैंछ | हमूल आपण नना क व्यवहार, बोलचाल, संगत, आदत, आहार और स्वच्छता पर जरूर  नजर धरण चैंछ | अगर शुरू बटि अनुशासन ह्वल तो अघिल जै बेर डांटणक सवाल पैद नि हवा | नना दगै अभिभावकोंक मित्रवत व्यवहारल उनर भविष्य भल रांछ और नान एक समझदार नागरिक बननी | तो अंत में य कूण चानू कि आपण नना लिजी टैम जरूर निकालिया नतर एक दिन पछताण पड़ि सकूं |”

पूरन चन्द्र काण्डपाल
20.01.2019

Friday, 18 January 2019

Nigambodhghat CNG : निगमबोधघाट CNG शव दाह

बिरखांत -247 : निगमबोध घाट पर शवदाह की परम्परा

      उत्तराखंड के सरोकारों से सराबोर होने की बात तो हम सब करते ही हैं परन्तु अपने हिस्से का क्रियान्वयन हम नहीं करते | हम ‘बन बचाओ, नदी बचाओ, पेड़ लगाओ, प्रकृति से छेड़छाड़ मत करो और शराब-धूम्रपान-गुट्का से उत्तराखंड को बचाओ’ भी कहते हैं | हम गंगा-यमुना की स्वच्छता बहश में भागीदारी भी करते रहे हैं | परन्तु न हमें पेड़ लगाने की चिंता हैं, न पर्यावरण बचाने की और न नदी बचाने की |  उदहारण के लिए दिल्ली में यमुना किनारे स्थित निगम बोध श्मशान घाट की चर्चा करते हैं |

      यहाँ पर उत्तराखंड एवं कुछ अन्य जगहों के लोग शवदाह यमुना नदी के किनारे करते हैं और चार-पांच घंटे में शव दाह कर सम्पूर्ण राख-कोयला यमुना में बहा देते हैं | काला गंदा नाला बन चुकी यमुना की दुर्दशा निगमबोध घाट पर देखी नहीं जा सकती है | यहाँ पर शवदाह की व्यवस्था (CNG) सी एन जी फर्नेश से भी है | छै फर्नेश (भट्टी) चालू  हालत में हैं | एक शवदाह में एक घंटा बीस मिनट का समय लगता है | शवदाह में समय तो बचता ही है एक पेड़, पर्यावरण, हवा और यमुना भी बचती है और शवदाह में कर्मकांड की वे सभी क्रियाएं भी की जाती हैं जो लकड़ी के दाह में की जाती हैं | शवदाह में सी एन जी खर्च मात्र एक हजार रुपये है जबकि लकड़ियों का खर्च ढाई से पांच हजार रुपये तक हो जाता है | अक्सर फट्टे, लकडियां, चीनी दोबारा मंगाई जाती हैं क्योंकि फट्टे और चीनी में मुर्दाघाट में भी कमीशन का यमराज बैठा है |

      यह सब जानते हुए भी लोगों का रुझान सी एन जी दाह के प्रति नहीं दिखाई देता | अन्धविश्वास की जंजीरें उन्हें बांधे हुए हैं | तर्क दिया जाता है कि ‘हमारी परम्परा लकड़ी में ही जलाने की है और लकड़ी में जलाने से ही मृत व्यक्ति सीधा स्वर्ग जाएगा |’ यमुना के मायके वाले उत्तराखंडियों को तो यमुना की अधिक चिंता होनी चाहिए |

     यदि मानसिकता नहीं बदली तो प्रधानमंत्री के बनारस को क्योटो बनाने के सपने का क्या होगा ? वहां भी पण्डे घाटों की स्वच्छता में कुछ न कुछ रोड़ा अटका रहे हैं | पेड़, पर्यावरण, प्रदूषण एवं नदियों की चिंता के साथ आज रुढ़िवादी एवं अंधविश्वासी परम्पराओं-प्रथाओं को बदलने की आवश्यकता भी है | क्या हम सोसल मीडिया के भागीदार इन मुद्दों पर जनजागृति करेंगे ? वक्त आने पर इसे अपनायेंगे या अपनाने को कहेंगे ? या सिर्फ दूसरों से ही इस कदम की अपेक्षा करेंगे ? हो सके तो इस मुद्दे पर चर्चा करें और वक्त आने पर क्रियान्वयन में मदद करें |

          कौन क्या कर रहा है, बात यह नहीं है | मुख्य बात है कि हम क्या कर रहे हैं ? कथनी –करनी में अंतर हम रोज देखते हैं | शराब-धूम्रपान-गुट्के के विरोध में मंच से कविता पाठ करने वाले तथा लम्बे-लम्बे भाषण देने वालों को मैंने उसी समारोह के समापन के तुरंत बाद शराब गटकते, सिगरेट पीते और गुट्का फांकते देखा है | पर उपदेश.. के प्रवचनों की हमारे इर्द-गिर्द बाड़ आई है | हम स्वयं से इन सवालों को पूछें और अपने हिस्से का क्रियान्वयन से कतराएं नहीं | अगली बिरखांत में कुछ और...

पूरन चन्द्र काण्डपाल
19.01.2019

Thursday, 17 January 2019

Ramchandr ka sach : रामचंद्र का सच

खरी खरी - 373  :  'राम चन्द्र' का 'पूरा सच' के साथ सत्य की जीत

      पाखंडी बाबा के वेश में अध्यात्म का आडम्बर ओड़े , पाखंडी प्रवचन से गुमराह करने वाला जो बलात्कारी अब 20 वर्ष की जेल में अपने कुकृत्यों के फल भोग रहा है उसका यह कुकृत्य दबा ही रह जाता यदि एक साहसी पत्रकार राम चन्द्र छत्रपति 2002 में अपने सांध्यकालीन सिरसा से छपने वाले हिंदी अखबार 'पूरा सच' में उस गुमनाम पत्र को नहीं छापता जो एक यौन शोषित साध्वी ने लिखा था । इस गुमनाम पत्र ने डेरा सच्चा सौदा की गुफा में हुए कुकृत्य, बलात्कार और कई साध्वियों के यौन शोषण को उजागर किया था । ज्योंही पत्र अखबार में छपा पत्रकार राम चंद्र छत्रपति को धमकियां मिलने लगी और 24 अक्टूबर 2002 को उन्हें दो हत्यारों ने उनके घर के आंगन में गोली मार दी जिससे 21 नवम्बर 2002 को उनकी अस्पताल में मृत्यु हो गई ।

     इस गुमनाम पत्र के आधार पर पंजाब- हरयाणा उच्च न्यायालय ने सेसन जज सिरसा से इस संबंध में रिपोट मांगी और रिपोट मिलते ही 24.09.2009 को इस केस की सीबीआई जांच के आदेश दे दिए । यह केस पूरे पन्द्रह वर्ष चला । यह मामूली लड़ाई नहीं थी । यह एक दीये की तूफान से लड़ाई थी जिसे दिवंगत पत्रकार के पुत्र अंसुल छत्रपति और दो गुमनाम साध्वियों ने जान की परवाह नहीं करते हुए अंत तक लड़ा जबकि देश का पूरा राजनैतिक तंत्र और सिस्टम अपने वोट बैंक के खातिर एक पाखंडी के चरण चूमता रहा ।

     जब पिछले साल उस पाखंडी को सजा मिली तो पूरे देश ने राहत महसूस की है । आज पूरा देश उन दो गुमनाम साध्वियों, साहसी दिवंगत पत्रकार राम चन्द्र छत्रपति, उच्च न्यायालय के जस्टिस गोयल, सीबीआई के पुलिस सुपरिंटेंडेंट सतीश डांगर, अंसुल छत्रपति के साथ ही पाखंडी को सजा देने वाले जस्टिस जगदीप सिंह के साहस, श्रम और निष्पक्षता को सलाम करता है, प्रणाम करता है और नमन करता है । आज अपनी जान की परवाह नहीं करने वाले दिवंगत पत्रकार राम चन्द्र छत्रपति को विनम्र श्रद्धांजलि देते हुए हम उनकी हिम्मत को भी प्रणाम करते हैं ।

     देर- सबेर आज न्याय की एक औऱ जीत हुई जब गुरमीत राम रहीम सहित तीन अन्य को पत्रकार हत्या केस में आजीवन कारावास की सजा मिली है । एक ओर जहां भीड़ तंत्र ने हमारे सिस्टम और राजनीति को बौना बनाया वहीं हमारे न्याय तंत्र ने एक पाखंडी को सलाखों के पीछे पहुंचाया । एक दुष्कर्मी और हत्यारे की करतूत को न्याय तक पहुंचाने वाले इन सभी साहसी वीरों, न्याय और ईमानदारी के पहरुओं को एक बार पुनः नमन , जयहिन्द ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
18.01.2019

Putrada ekadashi : पुत्रदा एकादशी

खरी खरी - 372 :  पुत्रदा एकादशी

     सुना है आज 17 जनवरी 2019 को कुछ लोग अपनी पत्नी से पुत्रदा एकादशी का व्रत रखवा रहे हैं । आपको, पत्नी को, दादा- दादी को, परिवार में सबको पुत्र चाहिए । किसी किसी के घर में तो तीन -तीन पुत्रियाँ पहले से हैं । नारे तो 'बेटी ये...और बेटी वो...' के लगाए जा रहे हैं । वोट मांगने वाले भी चिल्ला रहे हैं 'बेटी बेटी' भलेही अपने घर में मां, पत्नी, बहू या बेटी से अवांच्छित व्यवहार करें ।

       पुत्र की चाह में यह पुत्री का अपमान है । ठीक से परवरिश होने पर बेटी आज किसी भी क्षेत्र में बेटे से कम नहीं है । विज्ञान, कला, साहित्य, प्रबंधन, सेना, पुलिस, राजनीति सहित कोई भी क्षेत्र अब बेटी से वंचित नहीं है । प्रथा-परम्परा के नाम पर अंधविश्वास की जंजीर से बंधे कुछ लोग आज भी बेटी को दूसरे दर्जे का नागरिक समझते हैं । उन्हें वंश चलाने, पिंडदान -श्राद्ध  करने, बहू के साथ दहेज लाने के लिए बेटा चाहिये । 'son syndrome' (पुत्र चाह) नामक बीमारी से ग्रसित ये लोग अपनी बेटी को आज भी पराया धन समझते हैं । यह अब गैर कानूनी तो है, बेटियों का सरासर अपमान भी  है ।

       हमें समय के अनुसार बदलाव स्वीकार करना चाहिए । हमारे लिए दो बच्चे ही घर में अच्छे हैं चाहे वे पुत्र हों या पुत्री । हमें पुत्री को भी वही शिक्षा और वातावरण देना चाहिए जो हम बेटों को देते हैं । कुछ लोग ऐसा कर भी रहे हैं । माता या पिता के दिवंगत होने पर अब बेटियाँ अर्थी को कंधा देती हैं और शव को मुखाग्नि देती हैं । अटल जी की नातिन ने यह सब किया । अतः 'पुत्रदा' के नाम पर व्रत रखवाना लड़की की तौहीन करने जैसा है । वैसे भी व्रत रखने से पुत्र नहीं होता, हां तुक्का लगने से किसी की दुकान जरूर चलती है । पुत्र 'xy' क्रोमोजोम के मिलन से होता है (यह भी विज्ञान के हाथ में नहीं है),  जिसकी चर्चा पहले कई बार कर चुका हूँ । अतः 'पुत्रदा' का जाप छोड़कर मात्र दो बच्चों से ही संतुष्टि होनी चाहिए चाहे वे पुत्र हों या पुत्री ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
17.01.2019

Wednesday, 16 January 2019

Hamari bhasha hamari pachhyan : हमरि भाषा हामरी पछ्याण

मीठी मीठी - 218 : 'हमरि भाषा हमरि पछ्याण'

          उतरैणीक दिन कुमाउनी में म्येरि नईं किताब 'हमरि भाषा हमरि पछ्याण' कुछ मित्रोंक बीच में लोकार्पित करिगे । कुमाउनी में य म्येरि 12उं किताब छ । नना कैं हमरि भाषा सिखूणक य किताब में म्यर एक प्रयास छ । किताब में पैल पाठ 'स्वर' बटि शुरू हुंछ । व्यंजन, बारहखड़ी, गिनती, पहाड़, फल- फूल, साग-सब्जि, अनाज, फसल, कहाण, मसाल, भोजन, लात-लुकुड़, जेवर, चाड़, किड़- मकौड़, पशु, रिश्त-नात, शरीरक अंग, त्यार, महैण, ऋतु, मौसम, राज्यक प्रतीक, उत्तराखंड राज्य, भाषा, गैरसैण, ऐतिहासिक तारिक, खाश दिवस आदि  विषयों पर य किताब में चर्चा छ ।

      किताब में व्याकरणकि सूक्ष्म जानकारीक साथ 30 लघुलेख लेख (हिंदी अनुवादक साथ), 10 अनुच्छेद, 10 कहानि, 6 चिठ्ठी समेत अन्य भौत कुछ छ य किताब में । सबै शब्दोंक हिंदी अनुवाद लै दगाड़ में छ । किताबक प्रकाशक छीं - 'कुमाउनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति कसारदेवी, पोस्ट डीनापानी अल्मोड़ा (उत्तराखंड)।' 104 पृष्ठोंकि य किताबकि पेपर बैक कीमत ₹ 120/- ( ₹ 20/- कि छूट पर ₹ 100/-) छ । किताब मोब.9871388815 पर उपलब्ध छ ।)

पूरन चन्द्र काण्डपाल
16.01.2019

Sena diwas : सेना दिवस

मीठी मीठी - 217 :15 जनवरी, सेना दिवस

    आज के दिन 1949 में भारतीय सेना के कमांडर इन चीफ जनरल के एम करिअप्पा बने थे । तब से प्रतिवर्ष 15 जनवरी को सेना दिवस मनाया जाता है । एक बार जो सैनिक बन जाता है वह हमेशा ही अपने को सैनिक समझता है । ऐसा सभी पूर्व सैनिक सोचते हैं ।

     मुझे वह क्षण याद आता है जब आज से 47 वर्ष पूर्व हमने अपने साथियों के साथ 3 दिसंबर से 16 दिसंबर 1971 में 14 दिन की लड़ाई में पश्चिमी और पूर्वी सीमा पर दुश्मन से घुटने टिकवाये थे । तब मेरी उम्र 23 वर्ष थी । इस युद्ध में जीत के बाद राष्ट्र ने युद्ध में भाग लेने वाले सैनिकों को पश्चिमी और पूर्वी स्टार प्रदान किये थे । उस पश्चिमी स्टार को देखकर उन क्षणों की याद ताजा कर लेता हूँ ।  सेना दिवस के अवसर पर सभी को शुभकामनाएं ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
15 जनवरी 2019

Utraini : उतरैणी

मीठी मीठी - 216 : राजधानी में उतरैणी आयोजन

     कल 14 जनवरी 2018  सोमवार को देश के  राजधानी क्षेत्र में उतरैणी महोत्सव कई जगहों पर बड़ी धूम-धाम से मनाया गया । दिल्ली सरकार ने इस बार उत्तराखंड की 62 पंजीकृत संस्थाओं को इस पावन पर्व को मनाने के लिए आर्थिक सहयोग दिया था । यह सहयोग विगत 4 वर्ष से मिल रहा है । पहले वर्ष 4 स्थानों, दूसरे वर्ष 20 स्थानों और इस वर्ष 32 स्थानों पर दिल्ली सरकार के सहयोग से उतरैणी मनाई गई । इस सहयोग के लिए दिल्ली सरकार को साधुवाद ।

     उतरैणी का दिन बहुत व्यस्त रहा । कई जगह से आमंत्रण था । मात्र दो जगहों पर उपस्थिति दर्ज करा सका । सबसे पहले प्रातःकालीन सत्र में देवभूमि उत्तराखंड धार्मिक- सामाजिक विकास संगठन (पंजी), रोहिणी सेक्टर 3 दिल्ली औऱ अपरान्ह सत्र में उत्तराखंड भ्रातृ मण्डल (पंजी) अवन्तिका दिल्ली में अपने समाज के बीच उतरैणी के अवसर पर आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों का रसास्वादन किया । दोनों ही संस्थाओं  की पूरी टीम को इस सफल आयोजन के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामना ।

       सेक्टर 3 के सांस्कृतिक आयोजन को दिव्य कला संगम केंद्र पटेल नगर दिल्ली के कलाकारों ने सुश्री देवकी शर्मा के निर्देशन में प्रस्तुत किया । इस अवसर पर लोकगायक बिसन हरियाला, देवकी शर्मा, मोहन चन्द्र मिश्रा, योगेन्द्र कुकरेती सहित कई गायकों और कलाकारों ने सुन्दर गीत-नृत्य प्रस्तुत किये । कला संगम की टीम द्वारा प्रस्तुत दो नाट्य प्रस्तुतियों - पलायन की व्यथा और विवाह संस्कृति को दर्शकों ने खूब सराहा । इस अवसर पर संगीतकार चंचल प्रसाद गिरी जी, वरिष्ठ समाजसेवी श्री के एस बिष्ट (बिष्ट प्रोपर्टीज) सहित कई गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे । संस्था के अध्यक्ष श्री नारायन दत्त लखेड़ा, वरिष्ठ समाजसेवी भूपाल सिंह बिष्ट  एवं उनकी टीम के अथक प्रयास से आयोजन सफल रहा ।

        अपराह्न में आयोजित किये गए उत्तराखंड भ्रातृ मण्डल (पंजी) अवन्तिका दिल्ली के सांस्कृतिक कार्यक्रम को सजवाण म्यूजिकल ग्रुप साकेत दिल्ली द्वारा प्रस्तुत किया गया । इस आयोजन में भी दर्शकों ने उत्तराखंड की गीत-गंगा का आनन्द प्राप्त किया । संस्था के अध्यक्ष श्री एन डी लखेड़ा और उनकी टीम का इस सफल आयोजन के लिए भरपूर सहयोग रहा ।

     हमारे समाज ने एकजुटता दिखा कर राजधानी में अपनी पहचान बनाई है  । इसके लिए सभी मित्रों को साधुवाद । उठे हुए कदम आगे को बढ़ते रहें, यह हमारा लक्ष्य होना चाहिए और अपनी एकजुटता की मशाल को निरंतर प्रज्ज्वलित रखने के लिए दृढ़ संकल्प करना चाहिए । इस पावन अवसर पर हमें अपनी भाषा, संस्कृति, साहित्य और संस्कारों का संरक्षण करते हुए इन्हें संजोए रखने का भी दृढ़ संकल्प करना होगा । सभी मित्रों को उतरैणी/मकरैणी की बहुत -बहुत शुभकामनाएं ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
15.01.2019