Tuesday, 16 October 2018

Mitoo guji ki chapet:मीटू गुजि कि चपेट

मीठी मीठी - 171 : 'मीटू' गुजि कि चपेट (व्यंग्य)

     मुणि लेखी कैटेगरी वाव मैंस कभतै लै 'मीटू' गुजि कि चपेट में ऐ सकनी, जरा बचि बेर रया -

सैणियाँ हैं हँसि बेर बलाणी,
सैणियाँ दगै गपसप मारणी,
सैणियाँ उज्यां देर तली घूरणी,
सैणियाँ कैं वाहन में लिफ्ट दिणी,
उनरि ड्रेसकि तारिफ करणी,
'होइ' में उनू पर गुलाल घसोड़णी,
पड़ोसक सागकि तारिफ करणी,
ऑफिस में उनू दगै लंच बांटि खाणी,
पड़ोसवाइ दगै ज्यादै बात मारणी,
बस में सैणियाँ कैं नजीक भटाउणी,
पार्टी में उनार नजीक ठाड़ हुणी,
उनू दगै ज्यादै खितखिताट पाड़णी,
घरेतिय सैणियाँ दगै मजाक करणी,
भीड़ में सैणियाँक ढयस सहन नि करणी ।

(और लै कतू कारण है सकनीं । बखत बदलि गो । आब मैंसों कैं छां लै फुकि- फुकि बेर पिण पड़लि ।)

पूरन चन्द्र काण्डपाल
17.10.2018

Monday, 15 October 2018

Meetoo : मीटू को समझो

खरी खरी - 326 :  'मी टू' को समझने की जरूरत !

      मेरे मित्र चनरदा से आज सुबह ज्योंही पार्क में मिलन हुआ मैंने पूछा, "कल सायं घूमने नहीं आये, क्या बात हो गई ? कहीं रामलीला देखने चले गए थे क्या ? चनरदा बोले, "नहीं यार डाक्टर के पास गया था । अखबार में आया था कि 'मीटू' वायरस फैल रहा है ।  ये 'मीटू' बीमारी क्या है, उसी का पता करने गया था ।"
"तो पता लगा ?"
"हाँ, सब बताया उस भले मानष डाक्टर ने, डिटेल में बताया । बड़ी खतरनाक बीमारी है । दबा हुआ दर्द कभी भी प्रकट हो सकता है । सहन करने की भी एक मियाद होती है । इस बीमारी की घुटन को बरदास्त करना आसान नहीं है । व्यक्ति डिप्रेसन में जा सकता है ।''
"डाक्टर ने इलाज क्या बताया ?"
"डाक्टर बोला, 'यदि वायरस का अटैक खतरनाक हुआ है तो इलाज होना ही चाहिए जैसे कि अशाराम टाइप केस में हुआ परन्तु सबूत पक्के होने चाहिए । और यदि उस तरह का नहीं है तो तब भी बीमारी की रोकथाम के लिए कदम तो उठने ही चाहिए ।''
"तुम्हारा मन क्या कहता है ?"
"मेरे मन की छोड़ो । उसके मन की कहो जिस पर बीती होगी या बीत रही होगी ?"
"फिर भी कुछ निदान तो हो रोग का ?"
" निदान तो है । जैन सम्प्रदाय वर्ष में एक बार "क्षमा दिवस" मनाते हैं । जाने -अनजाने जिनसे अपराध हुआ है वे खुले दिल से अपने अपराध की क्षमा मांगें । प्रायश्चित करें । प्रायश्चित अर्थात अपराध की पुनरावृत्ति न करें । केस पुराने हो गए हैं । यदि विनम्रतापूर्वक माफी मांगेंगे तो पीड़ित भी क्षमा कर देगा ।"
"माफी मांगने का अर्थ अपराध स्वीकार करना हुआ ? छवि खराब होने का डर । यह काम एक सेलिब्रेटी कैसे करेगा ?"
"अपराध करके सेलिब्रेटी बने हो तो पीड़ित को तो चुभेगा ही । अभद्र काम करके दिव्य पुरुष बन गया वह । अब माफी मांग लेगा तो क्या हो जाएगा ?''
"मामला जटिल है । माफी मांगने में ईगो हर्ट होती है ।"
"मीटू की पीड़िताएं यों ही दोष नहीं लगा सकती । यदि आरोपी माफी मांग लेते तो यह बात आगे नहीं बढ़ती ।"
"क्या पीड़िताएं दोषी नहीं हैं ? वर्षों बाद गढ़े मुर्दे खोद रहे हैं । तभी बोल देती ?''
"किसी ने बोला, किसी ने सह लिया । उधर कुआं इधर खाई नजर आई । किसी ने सपोर्ट नहीं किया । चुप रहने की ही सलाह मिली, घर से भी और बाहर से भी ।''
"इसका मतलब सब जगह पुरुष दोषी ?"
"मेरा मानना है छोटी-मोटी बातों को महिलाएं इगनोर करतीं हैं । अपवाद को छोड़कर कोई ऐसा पुरुष नहीं होगा जिसने छात्र जीवन से लेकर सेवानिवृत होने तक जाने-अनजाने किसी न किसी महिला का स्पर्श नहीं किया हो भलेही होली के बहाने ही सही ।''
"चनरदा ने भी ?''
"चनरदा ने होली नहीं खेली क्या?''
"तो आपके अनुसार जिन पुरुषों ने जाने - अनजाने उत्पीड़न किया है उनको क्या करना चाहिए ?"
"अब कितनी बार पूछोगे यार ? सौरी बोलो सौरी । से सौरी ! अगर गलती हुई है तो माफी मांग लो और केस खतम करो । सयाने- समझदार लोगों ने बड़े -बड़े केस क्षमा मांग कर तुरन्त निबटा लिए ।''
"अब ऐसे रोगी मर्द आगे क्या करेंगे ?''
"मीटू' अभियान से बात चर्चा में तो आई और दूर तक चली गई । कएक हिल गए । कएकों की नींद भी हराम हुई होगी । अब कोई भी मर्द उत्पीड़न करने से पहले सौ बार सोचेगा । हम पीड़िताओं के साथ हैं और ''मीटू" ग्रुप से सहानुभूति रखते हैं ।"

(ये चनरदा कौन है ? चनरदा हम -आप में से ही लेखक का एक पुराना किरदार है जो मसमसाने के बजाय बेझिझक गिच खोलने में विश्वास रखता है ।)

पूरन चन्द्र काण्डपाल
16.10.2018

Sunday, 14 October 2018

फटी पैंट का फैशन

खरी खरी - 325 : फटी पैंट का फैशन

      आजकल हम देखते हैं कि युवक- युवतियां घुटने से नीचे और घुटने से ऊपर, जांघ के ऊपरी सिरे से थोड़ा नीचे तक, कई जगह से फटी जीन्स पहन कर खुलेआम घूम रहे हैं । सबसे पहले मैंने यह दृश्य मेट्रो ट्रेन में देखा । उसके बाद इसी तरह की फटी जीन्स पहने प्रेमी जोड़ों को मेट्रो स्टेसन की सीढ़ियों में सट कर गर्दन एक -दूसरे की ओर झुकाए बैठे देखा । जंतर मंतर की ओर गैरसैण के लिए धरना-प्रदर्शन के लिए जा रहा था तो रास्ते में भी कई फटेहालों को देखा । कुछ मित्रों से पूछा तो वे बोले, "सर ये फटीचर नहीं हैं, ये फटेहाल गरीब नहीं हैं ,ये फैशन के फरिश्ते हैं । बाजार में फटी पैंट पहनने का नया फैशन आ गया है ।" मैं सोचने लगा 'यदि कमर से ऊपर के फटे वस्त्र पहनने का फैशन भी आ गया तो तब देश का क्या होगा ?"

      इसी सोच में मुझे अपने मिडिल स्कूल का जमाना याद आ गया जब मैं और मेरे जैसे कई छात्र तीन टल्ली (पैबंद) लगी सुरर्याव (पैंट) पहने स्कूल जाते थे । हमारे घरवाले पैंट फटने पर उस पर तुरन्त टल्ली लगवा देते थे । हम फटी पैंट पहन कर कभी बाहर नहीं गए । परन्तु आज जमाने की बलिहारी देखो युवा फैशन के नाम पर पैंट फाड़े सीना तान कर चल रहे हैं । वाह रे ! पैंट-फाड़ फैशन । युवतियों की फटी पैंट पर एकबारगी नजर पड़ते ही नजर झुक जाती है । मेरा आश्चर्य का ठिकाना तो तब नहीं रहा जब एक लड़का बोला, "अंकल इन फटी पैंटों की कीमत बिनफटी पैंटों से अधिक है, क्योंकि यह फैशन की फाड़ है ।"

     अब तो फटी पैंटों को देख आश्चर्य भी नहीं होता, शायद नैनों ने समझ लिया है कि इस तरह के वस्त्र- फाड़ अंग-दिखाऊ नए नए फैशन आने वाले वक्त में देखने को मिलते रहेंगे और हमारी सभ्यता को मुँह चिढ़ाते रहेंगे । वस्त्र डिजायनर कहीं हमें पुनः उसी युग में तो नहीं ले जाना चाहते जिस युग में सबसे पहले मानव ने पेड़ों की छाल और पत्तों से शरीर ढकना सीखा था ?

पूरन चन्द्र काण्डपाल
15.10.2018

Saturday, 13 October 2018

Vandematrm : वंदेमातरम के हकदार

खरी खरी - 324  : वंदेमातरम के हकदार

      'वंदेमातरम' हमारा राष्ट्रीय गीत ही नहीं हमारी राष्ट्रीय एकता का प्रतीक भी है । यह किसी राजनैतिक दल विशेष का नारा भी नहीं है । इतिहास के पन्नों को देखें तो इस गीत ने हमारे देशवासियों में एक ऐसी बेमिसाल ताकत भरी जिसके सामने अंग्रेज थर्रा उठे । 1876 में जब बंकिम चंद्र चटर्जी ने इस गीत की रचना की तब से इस गीत को देश में गाया गया और राष्ट्रभक्ति का पुनर्जागरण हुआ । हिन्दू -मुस्लिम सहित सभी धर्मों के अनुयायी इस गीत को गाते हुए स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े ।


      अपनी संकीर्ण महत्वाकांक्षा के कारण जिन्ना ने धार्मिक भावना भड़काने के लिए इस्लाम का सहारा लेते हुए कुछ मुसलमानों से इस गीत का बहिष्कार करवाया । मुस्लिम कट्टरवाद आज भी इसका विरोध करता है जबकि इस गीत का शाब्दिक अर्थ है "मां तुझे नमन" या " मां तुझे सलाम ।" आजादी के 71 वर्षों बाद भी इस पर विरोध नहीं होना चाहिए और सभी देशवासियों को इसे निर्विवाद गाना दिखावे के लिए नहीं बल्कि पूर्ण आस्था के साथ गाना चाहिए ।


       कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री ने उन लोगों से सवाल पूछा है कि जो लोग  मुंह से तो 'वंदेमातरम' कहते हैं और धरती में जहां-तहां कूड़ा डालते हैं । क्या यह 'वंदेमातरम' का मजाक नहीं है ? देश में कूड़ा डाल कर 'वंदेमातरम' कहना ठीक नहीं है । हमें उनके शब्दों को समझना चाहिए और स्वच्छता अभियान में योगदान देना चाहिए तभी हम वास्तव में 'वन्देमातरम' कहने के हकदार हैं ।


पूरन चन्द्र काण्डपाल 

14.10.2018


Friday, 12 October 2018

अखबार में देवी- देवता

खरी खरी -323 :अखबार में देवी-देवता


     समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में हमारे आराध्य देवी-देवताओं के चित्र धड़ल्ले से छपते रहे हैं । आजकल नवरात्रों में नौ दिन तक देवी के विभिन्न रूपों के चित्र छपते रहेंगे । राम नवमी पर श्रीराम के और जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण के चित्र भी छपते  आ रहे हैं । यह सब बंद होना चाहिए ।


     जब अखबार रद्दी में जाता है तो उसमें सभी वस्तुएं लपेटी जाती हैं । यहां तक कि जूते-चप्पल सहित कुछ भी लपेटा जाता है । मांस- मदिरा भी लपेटी जाती है । यह उन आराध्य चित्रों का घोर अपमान है । इसी तरह घर के मंदिर में पूजी गई पुरानी मूर्तियों -फोटो को भी लोग किसी पेड़ के नीचे पटक देते हैं जहां इन्हें पशु चाटते हैं । 


    इन आराध्य चित्रों/मूर्तियों  को तोड़कर जमीन में भू-विसर्जित करना चाहिए । इन मुद्दों पर भी आवाज उठनी चाहिए ताकि ये चित्र समाचार पत्र-पत्रिकाओं में न छपें और मूर्तियां जहां-तहां न फेंकी जाएं । इस विषय पर पहले भी कई बार चर्चा होते रही है परन्तु परिणाम शून्य ही रहा । 


     श्रद्धा-आस्था के इन चित्रों का प्रिंट मीडिया में छप कर इस तरह अपमान होते देख हम चुप क्यों रहते हैं ? मूर्तियों का इस तरह अनादर हम क्यों करते हैं ?सबसे ज्यादा अनादर गणेश जी का होता जिन्हें शुभकार्यों में विभिन्न तरह से (शादी कार्डों में भी) प्रयोग करके फैंक दिया जाता है । शायद हम इस प्रतीक्षा में हैं कि इस पर प्रतिबंध लगाने हेतु आंदोलन करने कोई और आएगा और हम लकीर के फकीर बने रहेंगे । ये हमारी कैसी श्रद्धा है ? मंथन तो करें ।


पूरन चन्द्र काण्डपाल

13.10.2018

Thursday, 11 October 2018

Sadak durghatanaayein : सड़क दुर्घटनाएं

बिरखांत- 233 : कब थमेंगी सड़क दुर्घटनाएं ?

    एक सर्वे के अनुसार हमारे देश में प्रतिवर्ष सड़क दुर्घटना में करीब एक लाख तीस हजार (350 मृत्यु प्रतिदिन अर्थात प्रति चार मिनट में एक मृत्यु ) लोग अपनी जान गंवाते हैं | इस तरह बेमौत मृत्यु में हमारा देश विश्व में सबसे आगे बताया जाता हैं | कैंसर, क्षय रोग, मधुमेह, हृदय गति व्यवधान आदि रोंगों के बाद देश में सड़क दुर्घटना में मरने वालों के संख्या आती है | इस बेमौत मृत्यु में दुपहिया वाहन चालक/सवार सबसे अधिक हैं जिसमें 18 वर्ष से कम उम्र के किशोरों की मृत्यु दर 12 % है | सड़क दुर्घटना में करीब पांच लाख लोग घायल होते हैं जिनमें अधिकाँश अपंग हो जाते हैं | दो वर्ष पहले केन्द्रीय मंत्री गोपीनाथ मुंडे की अकाल मृत्यु भी 3 जून 2014 को सड़क दुर्घटना में हुयी थी | वर्तमान में कोई भी दिन ऐसा नहीं बीतता जब हम टी वी में क्षत-विक्षत शव तथा चकनाचूर हुए वाहनों के दृश्य नहीं देखते हों |

     देश की राजधानी में प्रतिदिन सड़क दुर्घटना में पांच लोग मरते हैं जिनमें औसतन दो पैदल यात्री और दो दुपहिया चालक हैं | प्रति सप्ताह दो  साइकिल चालक तथा एक कार चालक सड़क दुर्घटना में मरता है | सड़क दुर्घटनाओं के मुख्य कारण हैं बिना लाइसेंस के वाहन चलाना, वाहन चलाने का अल्पज्ञान होना, सिग्नल जम्पिंग, वाहन से सिग्नल नहीं देना, ओवर स्पीड (गति सीमा से अधिक ), ओवर लोड, शराब पीकर वाहन चलाना, रोड रेस (एक दूसरे से आगे निकलने की जल्दी), सड़क पर गलत पार्किंग, चालक की थकान या झपकी आना, लापरवाही, डेक का शोर अथवा मोबाइल पर ध्यान बटना आदि | विपरीत दिशा से आरहे वाहन की गलती, हेलमेट कोताही, सड़क के गड्डे, तथा मशीनी खराबी आदि भी भीषण दुर्घटना के अन्य कारण हैं | 

     इन सब दुर्घटनाओं का मुख्य कारण है लोगों में क़ानून का डर नहीं होना | हमारे देश के लोग विदेश जाते हैं और वहाँ के नियम-क़ानून का पालन बखूबी करते हैं | स्वदेश आते ही यहां के क़ानून को अंगूठा दिखा देते हैं क्योंकि यहां क़ानून का डर नहीं है | सब जानते हैं कि शराब पीकर वाहन चलाने सहित सभी सड़क सुरक्षा के नियमों की अवहेलना में जुर्माना है परन्तु लोगों को जुर्माने की चिंता नहीं है | उन्हें घूस देकर छूटने का पूरा भरोसा है या जुर्माने की रकम अदा करने के फ़िक्र नहीं हैं | प्रतिवर्ष लाखों चालान भी कटते हैं |

      हमारे देश में बच्चे अपने अभिभावकों का वाहन खुलेआम चला कर दुर्घटना में कई निर्दोषों को मार देते हैं | कई बार बड़ी तेजी से उड़ती मोटरबाइक में एक साथ बैठे छै- सात बच्चे सड़क पर जोर जोर से हॉर्न बजाते हुए देखे गए हैं | इन दुपहियों में कार या ट्रक का हॉर्न लगाकर, रात हो या दिन जोर जोर से हॉर्न बजाते हुए उड़ जाना इन बिगडैल बच्चों का फैशन बन गया है | पुलिस या तो होती ही नहीं या देख- सुन कर भी अनजान बनी रहती है | अब जब दुर्घटनाओं की अति हो गई तब इन नाबालिगों द्वारा वाहन चलाने पर अभिभावकों को दण्डित करने की मांग उठ रही है |

     इस बीच उत्तराखंड में भी सड़क दुर्घटनाओं की बाड़ सी आ गई है जिससे कई घर उजड़ गए हैं | बारात, पर्यटन, तीर्थाटन, व्यवसाय आदि से जुड़े कई वाहन आये दिन दुर्घटनाग्रस्त हो रहे हैं | इसका कारण भी सभी सड़क सुरक्षा के नियमों की अवहेलना ही है | इन सभी दुर्घटनाओं को रोकने के लिए हमें अपने घर से शुरुआत करनी पड़ेगी | अपने नाबालिग बच्चों को भूलकर भी कोई वाहन नहीं दें ताकि सड़क पर कोई अनहोनी न हो | लाइसेंस प्राप्त बालिंग बच्चों का प्रशिक्षण भी उत्तम होना चाहिए | आप स्वयं भी वाहन चलाते समय संयम रखें क्योंकि दुर्घटना से देर भली | स्मरण रहे आपका परिवार प्रतिदिन आपकी सकुशल घर वापसी के इंतज़ार में रहता है | अगली बिरखांत में कुछ और...

पूरन चन्द्र काण्डपाल
12.10.2018

Wednesday, 10 October 2018

Rotee ke liye : रोटी के लिए

खरी खरी - 322 : सब कुछ रोटी के लिए

     हम सब रोटी के लिए ही तो दर दर भटक रहे हैं । कहीं रोटी मिलती नहीं तो किसी को रोटी पचती नहीं । कोई किसी की आंच में रोटी सेक रहा है तो कोई रोटी को चौबाट में फेंक रहा है । किसी की रोटी भद्र नहीं है तो कहीं रोटी की कद्र नहीं है । कोई रोटी की बाट देख रहा है तो कोई रोटी के लिए जेब काट रहा है । कुछ लोग रोटी कमाने के लिए दौड़ रहे हैं तो कुछ रोटी पचाने के लिए दौड़ रहे हैं । सुबह से लेकर देर रात तक, कहीं कहीं तो रात भर भी लोग रोटी के लिए ही भाग रहे हैं । जिस आटे की रोटी देश का सबसे धनी आदमी खाता है उसी आटे की रोटी देश का सबसे गरीब आदमी भी खाता है । और जब यही रोटी बेकद्री से सड़क पर पड़ी रहती है तो कई बातें उस व्यक्ति के दिल को चीरने लगती हैं जो दो जून की रोटी के लिए कभी तड़फा हो या तड़फ रहा हो ।


        महानगर की एक पॉश कालोनी के पार्क के गेट पर फेंकी हुई रोटियों का चित्र इन शब्दों के अंत में देखा जा सकता है । प्रश्न उठता है किसने फेंकी होंगी इतनी बेकद्री से ये रोटियाँ ? जिस घर से इन्हें फेंका गया होगा क्या वहाँ कोई रोटी की कद्र नहीं जानता होगा ?  शायद उसे रोटी कमाने का ज्ञान नहीं होगा या वह अब तक कभी भूख से तड़फा नहीं होगा । हम दिन में कम से कम तीन बार तो अपने पेट की आग इस रोटी से बुझाते हैं । एक बार रोटी न मिलने पर हमारी हालत बिगड़ने लगती है । 

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        हमारे देश में आज भी करीब 20% लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं । कई लोग तो दिन में केवल एक बार की रोटी भी बड़ी मुश्किल से प्राप्त कर पाते हैं । मेरा मानना है रोटियाँ उसी घर से फेंकी जाती हैं जहाँ भोजन का अनुशासन नहीं है । जब रोटियाँ हिसाब से बनेंगी तो बचेंगी नहीं और जब बचेंगी नहीं तो फेंकी भी नहीं जाएंगी । वैसे भी सुबह की बची रोटी रात को और रात की बची रोटी वह व्यक्ति तो अवश्य खा सकता है जो जीवन में रोटी के लिए कभी न कभी तड़फा हो ।  फेंकी गई इन रोटियों के चित्र को देखकर आज संकल्प करें कि हम अपने जीवन में कभी भी रोटी नहीं फेंकेंगे क्योंकि रोटी बहुत कीमती है, रोटी हमारी जिंदगी है और रोटी ईश्वर का दिया हुआ एक अमूल्य उपहार है ।


पूरन चन्द्र काण्डपाल

11.10.2018