Thursday, 17 August 2017

Ye theek nahee d m : ये ठीक नहीं किया डी एम

खरी खरी - 64 : ये ठीक नहीं किया तुमने डी एम!

     हाल ही की उस खबर से हम सब स्तब्ध हैं और आहत हैं कि जिला बक्सर के युवा डी एम ने गाजियाबाद के निकट मालगाड़ी के आगे कूद कर आत्महत्या कर ली । डी एम ने बक्सर में आत्महत्या का प्लान बनाया औऱ दिल्ली आ गए । स्यूसाइड नोट में औऱ वीडियो में वे अपनी मृत्यु के लिए किसी को जिम्मेदार भी नहीं ठहरा गए । डी एम 2012 के IAS थे । वे अपने पीछे रोते - बिलखते मां-बाप और पत्नी को छोड़ गए तथा एक छोटी सी बिटिया को अनाथ करके चले गए ।

    इस बंदे ने यह भयावह कदम क्यों उठाया ?  इतना पढ़ा-लिखा मेधावी इंसान उस घुटन और छटपटाहट को बर्दास्त नहीं कर पाया जो उसके पारिवारिक घरेलू कलह से उत्पन्न हुई थी । मरने से अच्छा था पत्नी से सम्बन्ध विच्छेद कर लेता या माता -पिता से अलग पत्नी के साथ रह लेता । आखिर इस बंदे ने आत्महत्या के लिए इतनी उतावली क्यों की ? उसके इस फैसले से देश ने एक बेहतरीन IAS अधिकारी खो दिया जो एक प्रश्न खड़ा कर गया कि क्या सास- बहू के झगड़े में बेटे/पति की बलि टाली नहीं जा सकती ? तुम खुद तो गए डी एम परन्तु अगिनत संवेदनशील इंसानों को आहत कर गए । तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था ।

     इस हृदयविदारक घटना से इसी तरह की समस्या से जूझ रहे पुरुषों को संयम से अपनी घुटन का समाधान निकलना चाहिए । आत्महत्या चाहे जिस कारण से भी की गई हो , इस कृत्य को कायराना कृत्य ही कहा जाता है । जिंदगी की मुश्किलों से जूझना और उनका साहस से संघर्ष करना मनुष्य का काम है । नित जारी रख अपना संघर्ष, तेरे साहस में तेरा उत्कर्ष...

पूरन चन्द्र काण्डपाल
17.08.2017

Tuesday, 15 August 2017

Manau pannar agast : मनौ पन्नर अगस्त

मीठी मीठी -23 :पन्नर अगस्त

अरे ओ फेसबुकियो,
अरे ओ व्हाट्सएपियो,
अरे ओ लेखक, कवियो,
अरे ओ साहित्यकारों,
अरे ओ देशा क पहरुओ,
अरे ओ भाषा प्रेमियो,
अरे ओ  पत्रकारों ,
अरे ओ इस्कूला क मास्टरो,
अरे ओ काश्तकारों,
उठो कमर कसो, 
अघिल हिटो,
नि हौ  पस्त
क्वे मनो झन मनो,
तुम जरूर मनौ
पन्नर अगस्त ।

पन्नर अगस्त कि शुभकामना ।
श्रीकृष्णजन्माष्टमी कि शुभकामना ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
15 अगस्त 2017

Sunday, 13 August 2017

Ham swatantr hain : हम स्वतंत्र हैं ।व्यंग्य

बिरखांत-172 : हम स्वतंत्र हैं (व्यंग्य )  

       71वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर, अपने इर्द- गिर्द की अनचाही तस्बीर को समर्पित है आज की यह व्यंग्य बिरखांत | लगभग दो सौ वर्ष फिरंगियों की गुलामी के बाद देश 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ | 26 जनवरी 1950 को हमारा संविधान लागू हुआ जिसमें आज तक 120 से अधिक  संसोधन भी हो चुके हैं | संविधान ने हमें जो स्वतंत्रताएं दे रखी हैं उन पर हमने नहीं सोचा क्योंकि हमारी मस्तिष्क में अपनी स्वतंत्र संहिता पहले से ही डेरा डाले हुए है | हमारी इस अलिखित स्वतंत्र संहिता की न कोई सीमा है और न कोई रूप | बिना दूसरों की परवाह किये जो कुछ हमें अच्छा लगे या हमारा मन करे वही हमारी असीमित स्वतंत्र संहिता है भलेही इससे किसी को परेशानी हो, कोई छटपटाये  या किसी का नुकसान हो | 

     चर्चा करें तो सबसे पहले बोलने की स्वतंत्रता को लें | हमें किसी भी समय, कुछ भी, कहीं पर भी बिना सोचे- समझे बोलने की छूट है | न छोटे- बड़े का ख्याल और न स्त्री- पुरुष का ध्यान | भाषा जितनी भी अभद्र या अश्लील हो बेरोकटोक निडर होकर उच्चतम उद्घोष के साथ बोलने पर भी हमें कोई रोक नहीं सकता | वैसे हमारी संसद में भी कुछ लोगों को असंसदीय भाषा बोलने की छूट है | गन्दगी फैलाना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है | हम कहीं पर भी- गली, मोहल्ला, सड़क, कार्यालय, सार्वजनिक स्थान, प्याऊ, जीना-सीड़ी, रेल, बस में बेझिझक थूक सकते हैं | बस में बैठकर बाहर किसी राहगीर पर, दो-पहिये सवार या कार पर थूकिये, खुल्ली छूट है | कार चला रहे हैं तो क्या हुआ, कहीं पर भी पच्च से थूकिये कोई कुछ नहीं कहेगा |

     मल-मूत्र विसर्जन की भी हमें पूरी छूट है | रेल की पटरी, नहर- नदी-सड़क के किनारे, कहीं पर भी करिए | कोई देखता है तो देखने दीजिये, आप अनदेखी करिए | कोई बिलकुल ही पास से गुजरता है तो गर्दन घुटनों के अन्दर घुसा दीजिये, देखने वाला थूकते हुए चला जाएगा | मूत्र विसर्जन आप कहीं पर भी कर सकते हैं | दीवार पर, पेड़ की जड़ या तने पर, बिजली- टेलेफोन के खम्बे पर, खड़ी बस या कार के पहियों पर, सड़क के किनारे या कोने अथवा मोड़ पर या जहां मन करे वहां पर | 

     अपने घर को छोड़कर कहीं पर भी कूड़ा- कचरा फैंकने की भी हमें पूरी स्वतंत्रता है | फल- मूंगफली या अंडे के छिलके, बचा हुआ भोजन, पोस्टर- कागज, प्लास्टिक थैली, गुटका- पान मसाला पाउच, माचिस तिल्ली, बीडी-सिगरेट के डिब्बे- ठुड्डे, डिस्पोजेबल प्लेट- गिलास, बोतल, नारियल आदि कहीं पर भी लुढ़का दीजिये | झाडू लगाओ कूड़ा पड़ोस की ओर धकाओ | कूड़े के ढेर ऐसी जगह लगाओ जहां वह दूसरों की समस्या बने | घर में सफेदी कराओ, मलवा या बचा हुआ वेस्ट पार्क, सड़क या गली में फैंको, कोई रोकने वाला नहीं |

      हमें अपने जानवरों को सड़कों पर खुला छोड़ने की पूरी छूट है | गाय, भैंस या सूवर के झुण्ड से सड़क के बीच कोई टकराए हमारी बला से | हमने कुत्ते पाले हैं तो उन्हें सड़क या पार्क में ही तो घुमायेंगे | मल- मूतर करवाने के लिए ही तो हम उन्हें वहां ले जाते हैं | पार्क-सड़क तो सभी का है, लोगों को देखकर अपने जूते –चप्पल बचा कर चलना चाहिए | हमारी यातायात समबन्धी आजादी तो असीमित है | बिना संकेत दिए मुड़ने, रात में प्रेशर हार्न बजाने वह भी किसी को बुलाने के लिए, तेज गति से वाहन चलाने, दु-पहिये में पांच -छै जनों को बिठाने, दूसरे की या किसी भी जगह वाहन पार्क करने, प्रार्थना पर बस न रोकने, बस में धूम्रपान करने, महिला- सीटों पर बैठने, भीड़ के बहाने बस में महिलाओं के शरीर से स्वयं को रगड़ते हुए आगे बढ़ने, वरिष्ठ जनों के अनदेखी करने, शराब- नशा लेकर वाहन चलाने तथा निर्दोष नागरिकों को टक्कर मारते हुए रफूचक्कर होने की भी हमें पूरी छूट है  |

     कहाँ तक बताऊँ, हमारी स्वच्छंदता के असीमित छूट का हम आनंद ले रहे हैं | महिलाओं को घूरने, उनपर कटाक्ष करने, द्विअर्थी संवाद बोलने, बहला-फुसला कर उन्हें अपने चंगुल में फ़साने, उनका यौन शोषण करने तथा उनका बना- बनाया घर बिगाड़ने की हमें खुल्ली छूट है | हमें झूठ बोलने, कोर्ट में बयान बदलने, बयान से मुकरने, घूस देने, धर्म-सम्प्रदाय के नाम पर विषवमन करने, असामाजिक तत्वों को संरक्षण देने, क़ानून की अवहेलना करने, रात को देर तक पटाखे चलाने, कटिया डाल कर बिजली चोरने, सार्वजनिक स्थानों पर नशा -धूम्रपान करने, किसी का चरित्र हनन करने, अश्लीलता देखने और पढ़ने, कन्याभ्रूण की हत्या करने, कालाबाजारी- मिलावट और तश्करी करने, फर्जी डिग्रीयां -प्रमाण पत्र लेने,  फुटपाथ खोदने, सड़क पर धार्मिक काम के नाम पर तम्बू लगाने, बिना बताये जलूस या रैली निकालने, यातायात जाम करने, गटर के ढक्कन और पानी के मीटर चुराने, पार्कों की सुन्दरता नष्ट करने, विसर्जन के नाम पर नदियों में रंग-रोगन युक्त मूर्तियाँ डालने और धार्मिक कूड़ा फैंकने, राजनीति में बेपैंदे का लोटा बनने, शहीदों और राष्ट्र भक्तों को भूलने और सरकारी दफ्तरों में बिना काम की तनख्वा लेने सहित हमारी अनेकानेक स्वतंत्रताएं हैं |

      ये सभी स्वतंत्रताएं हमें कहाँ ले जायेंगी ? क्या इन्हीं के लिए हमारे अग्रज शहीद हुए थे ? क्या मनमर्जी के  तांडव करने के लिए ही हम पैदा हुए हैं ? क्या हमें दूसरों की तनिक भी परवाह है ? हम अपना व्यवहार कब बदलेंगे ?  हम कानून का सम्मान करना कब सीखेंगे ? इन प्रश्नों को हम अनसुना न करें और इस व्यंग्य में वर्णित आजादी के बारे में स्वयं से जरूर सवाल करें  | स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं | अगली बिरखांत में कुछ और..

पूरन चन्द्र काण्डपाल, 
14 अगस्त 2017

Saturday, 12 August 2017

Kaus jamaan aigo : कौस जमान ऐगो

खरी ख़री - 63 : कौस जमान ऐगो

च्यालां क छीं गर्लफ्रैंड
च्येलियां क बौय फ्रैंड,
हाथों पर बादि रईं 
फ्रेंडशिपा क बैंड,
क्वे घुमरीं पार्कों में
क्वे डवां मुणि भैरीं,
औणी जाणियाँ कि परवा
न्हैति बेफिकर हैरीं,
शरम लिहाज क
निशान लै मटिगो,
कौस जमान देखौ
कौस जमान ऐगो ।

आब जनम दिन लै
नईं तरिक ल मनूं रईं,
केक़ा क माथ बै
मोमबत्ती जगूं रईं,
तीन आंखर अंग्रेजी
सबूंल सिखी है,
अंग्रेजी में कूं रईं
हैपी बर डे,
जैल दी जगूण चैंछी
उ दी नीमू फैगो,
कौस जमान देखौ
कौस जमान ऐगो ।

मतलबा क लोग हैगीं
मतलबा क यार,
दिखावटी दुनिय में
दिखावटी प्यार,
मतलब निकलि गोयौ
पै भुलि जानीं,
रूबरू मिलनी
अपन्यार है जानीं,
धरम करम न्हैगो
मतलबी रैगो,
कौस जमान देखौ
कौस जमान ऐगो ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
13.08.2017

Thursday, 10 August 2017

Dharmik hone ka dikgawa : धार्मिक होने का दिखावा

खरी खरी - 61 : धार्मिक होने का दिखावा

     धार्मिक आडम्बर हमारी जीवन-शैली बन गए हैं । हम प्रतिदिन किसी न किसी धार्मिक आयोजन में सहभागिता निभाते हैं । वहां हम ऐसा अभिनय करते हैं जैसे कि हम एक अच्छे इंसान हैं जिसे अपने पड़ोस, समाज और देश की बहुत चिंता है तथा हम देश के प्रत्येक कानून का बखूबी आदर करते हैं और हमने स्वयं में सुधार कर लिया है ।

     सत्य तो यह है कि हम पूरी तरह से दिखावे की जिंदगी जी रहे हैं और बाजार संस्कृति के अधीन होकर सामाजिकता, नैतिकता, देश-प्रेम, पड़ोस-प्रेम, परोपकार, कर्तव्यपारायणता, ईमानदारी , धैर्य, संयम, सहनशीलता सहित जीवन की अमूल्य निधियों को तिलांजलि दे चुके हैं । हम चोरी की बिजली से धार्मिक पंडाल की जगमगाहट करते हैं और आस्था के नाम पर सड़क या पार्क किनारे अवैध धार्मिक निर्माण करते हैं । ध्यान से देखने पर इस तरह की कई कानून अवहेलना आपको अपने ही क्षेत्र में दिखाई देंगी ।

     हमें धर्म के अर्थ को समझते हुए दिखावे के आडंबरों में समय बर्बाद नहीं करना चाहिए और स्वयं में बदलाव लाना चाहिए । कम से कम ऐसे ढकोसलों से तो बचना चाहिए जिससे आपके इर्द-गिर्द के लोगों के जीवन में बाधा पड़ती हो । जन- पीड़क दिखावा अनैतिक ही नहीं अपराध भी है ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
11.08.2017

     

Pattharmar yuddh bagwaal : पत्थरमार युद्ध बग्वाल

बिरखांत -171 : पत्थर युद्ध : बग्वाल

     उत्तराखंड में पुरातन परम्पराएं आज भी  जड़ जमाये हैं | बड़ी मुश्किल से पशु-बलि प्रथा अब कम हो रही है लेकिन चोरी-छिपकर खुकरी- बड्याठ अब भी चल रहे हैं | देवालयों में रक्तपात बहुत ही घृणित कृत्य हैं परन्तु जिन लोगों ने इसे उद्योग बना रखा है उनके बकरे बिक रहे हैं | जेब किसी की  कटती है और पिकनिक कोई और मनाता है | हम किसी से शिकार मत खाओ नहीं कह सकते परन्तु देवता- मसाण- हंकार के नाम पर किसी की जेब काटना जघन्य पाप ही कहा जाएगा | मांसाहार के लिए बुचड़ के दुकानें गुलज़ार तो हैं ही |

   परम्परा के नाम पर उत्तराखंड में आज भी मानव –रक्त बहाया जाता  है  | प्रतिवर्ष रक्षाबंधन के दिन जिला चम्पावत में वाराहीधाम देवीधुरा के खोलीखाड़- दूबाचौड़ मैदान में पत्थरों की बारिश होती है । भलेही इस वर्ष इसे फलों की वर्षा का रूप देने की कोशिश हुई फिर भी पत्थर वर्षा हुई और 334 लोग घायल हो गए । एक दूसरे पर पत्थर बरसाने वाले चार खामों के लोग बड़े जोश से मैदान में कूद पड़ते हैं | इस पत्थरबाजी को बग्वाल भी कहा जाता है | अपराह्न में मदिर के पुजारी की शंख बजाते ही पत्थरबाजी शुरू होती है जो कुछ मिनट तक पत्थरों की वर्षा से कई लोगों का खून बहने लगता है | जब पुजारी को यकीन हो जाता है कि एक व्यक्ति के खून के बराबर रक्तपात हो चुका है तो वे युद्ध बंद करा देते हैं  | इस युद्ध में दर्शकों सहित कई व्यक्ति घायल होते हैं जिनका बाद में उपचार किया जाता है |

     यह परम्परागत पाषाण युद्ध वर्षों से चला आ रहा है | इसी प्रकार का पत्थर युद्ध जिला अलमोड़ा के ताड़ीखेत ब्लाक स्तिथ सिलंगी गाँव में भी वर्षों पहले बैशाख एक गते (१४ अप्रैल ) को प्रतिवर्ष आयोजित किया जाता था जिसमें स्थानीय लोगों की दो टीमें ‘महारा’ और ‘फर्त्याल’ भाग लेती थीं | सूखे गधेरे में एक स्थान (खइ ) तय किया जाता था जिसे पत्थरों की वर्षा के बीच हाथ में ढाल लेकर पत्थरबाज छूने जाते थे | जो इस स्थान पर पहले पहुँच जाय उसे विजेता माना जाता था | यहाँ भी कई लोग घायल होते थे जिनका उपचार किया जाता था या खाट में डाल कर रानीखेत अस्पताल में ले जाया जाता था |

     पत्थरबाजी से खून बहाने को ‘देवी को खुश करने’ की बात मानी जाती थी | लगभग २०वीं सदी के ५वें दसक ( ६०-६५ वर्ष पहले ) के दौरान नव-युवकों ने इस पाषण युद्ध को बंद करवा दिया और उस स्थान पर झोड़े  (खोल दे देवी, खोल भवानी, धारमा केवाड़ा ...आदि ) गाये जाने लगे | अब झोड़े भी बंद हो गए हैं क्योंकि कौतिक एक नजदीकी स्थान पर होने लगा है, झोड़े वहीं होने लगे हैं | पत्थरमार युद्ध बंद होने से न कोई रोग फैला और न कोई अनहोनी हुई जैसा कि पुरातनपंथी भय दिखाकर प्रचारित करते थे |

   चम्पावत की इस पत्थरबाजी के खून –खराबे में भाग लेने वाले जोश से सराबोर खामों को आपस में मिल-बैठ कर सर्वसम्मति से इस पाषाण युद्ध को बंद करवाना चाहिए | इसकी जगह कोई खेल की टूर्नामेंट आरम्भ की जानी चाहिए जिसमें चार खामों की चार टीम या अन्य स्थानीय टीमें भाग लें और साथ में सांस्कृतिक कार्यक्रम भी करायें | पुरस्कार के लिए ट्रॉफी रखें |  ऐसा करने से उत्तराखंड में खेलों को प्रोत्साहन भी मिलेगा | हमें समय के साथ बदलना चाहिए।

      देश में पत्थरबाजी की कोई प्रतियोगिता नहीं होती | बग्वाल का जोश खेलों में परिवर्तित होना चाहिए | ‘देवी नाराज हो जायेगी’ का डर ग्राम सिलंगी में भी था जो एक भ्रम था | रुढ़िवाद को सार्थक कदम उठाकर और सबको साथ लेकर समाप्त करते हुए खेल भावना युक्त नूतन परम्परा आरम्भ करने की पहल होनी चाहिए | अगली बिरखांत में कुछ और...

पूरन चन्द्र काण्डपाल
10.08.2017

Tuesday, 8 August 2017

Seema par mustaidi : सीमा पर मुस्तैदी

खरी खरी - 60 : सीमा पर मुस्तैदी 

   हम सब जानते हैं कि पाकिस्तान के चार मालिक हैं -  सेना, आई एस आई, कठमुल्ला 
समर्थित आतंकवादी और बरायनाम सरकार जिसकी बिलकुल नहीं चलती। भारत के साथ अब तक के  युद्धों में पाक को मुंह की खानी पड़ी है। प्रत्यक्ष युद्ध में जीत की उम्मीद छोड़कर पाक ने छद्म युद्ध का रास्ता पकड़ा है। 
     यह छद्म युद्ध पाक सेना की देखरेख में आतंकवादियों से करवाया जाता है। पाक की नजर कश्मीर पर है।  वह छद्म युद्ध से भारत में ऐसा माहौल खड़ा करना चाहता है कि भारत की एकता में दरार पड़े और उथल- पुथल मचे। हमें इस चाल को समझना चाहिए। हर युद्ध के बाद फिर समझौता होता है। इतिहास इस बात का साक्षी है। यदि हम सड़क से संसद तक पाक के बहकावे में आकर उलझ गए तो उसकी यह छद्म चाल कामयाब हो जायेगी।

      वर्तमान स्तिथि  से निपटने का तरीका युद्ध और उन्माद नहीं है बल्कि हमें अपनी सुरक्षा को इतना चुस्त, दुरुस्त और चौकन्ना करना पड़ेगा कि  सीमा पार से इस ओर देखने का कोई साहस न कर सके। हमारी सेना ने विगत दिनों नियंत्रण रेखा पर जो आतंकवादी ढेर किये हैं उससे पाक बौखलाया हुआ है। चौकन्ना रहते हुए रणकौशल के साथ पाकिस्तान को बड़ी मुस्तैदी से जबाब दिया जाना चाहिए। साथ ही चीन के धोखे से भी सदैव चौकन्ना रहने की सख्त जरूरत है । मीडिया में  शहीदों का स्मरण और सम्मान तो हो परन्तु  उन्माद और अत्तेजना पर अंकुश रहे।

पूरन  चन्द्र काण्डपाल
09.08.2017