Wednesday, 20 January 2021

Gvel devta : गोलू देवता

बिरखांत- 354 : ग्वेल/ गोरिया /गोलु ज्यु, एक न्यायप्रिय राजा

     उत्तराखंड में ग्वेल/ गोलु/ गोरिल/ गोरिया/ दूदाधारी आदि नाम से जिस देव की पूजा होती है आज की बिरखांत उन लोगों को समर्पित है जो इस देवता में श्रद्धा रखते हैं | भगवान् तो निराकार है, उसे न किसी ने देखा है और न कोई उससे मिला है | फिर भी जब हम व्याकुल होते हैं तो उसे याद करते हैं | कुछ लोग मनुष्य रूप में आकर अपने कर्म से इतने लोकप्रिय हो जाते हैं कि लोग उन्हें देव तुल्य मानते हैं | ऐसे ही एक देवता गोलु भी हैं जिनके उत्तराखंड में कई मंदिर हैं | जगरियों (दास ) के मुख से सुनी गाथा और कुछ ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार गोलु देवता जो उस क्षेत्र के रक्षक माने जाते हैं, इसकी काव्य गाथा मैंने अपनी पुस्तक “उकाव-होराव” (2008) में लिखी है जिसकी कहानी कुछ इस तरह है –

     उत्तराखंड में कत्यूरी शासन काल ईसा पूर्व 2500 से 700 ई. तक लगभग 3200 वर्ष रहा | इस शासन में सूर्यवंशी- चक्रवर्ती राजा हुए जिनका विस्तृत राज्य था | गोलु ज्यु भी कत्यूरी वंश के राजा थे | उनके परदादा तिलराई, दादा हालराई और पिता झालराई थे | गढ़ी चम्पावती -धूमाकोट मंडल इस क्षेत्र का केंद्र था | झालराई के सात विवाह करने पर भी संतान नहीं हुई | आठवीं शादी कालिंका से हुई जिसे पंचनाम देवों की बहन बताया जाता है | कालिंका के गर्भ में गोलु के आते ही सातों सौत ईर्ष्या करने लगी | उन्होंने प्रसव होते ही एक संदूक में गोलु को बहा दिया और प्रसव में ‘सिल- बट्टा’ पैदा हुआ बता दिया’ | संदूक गोरिया घाट पर एक धेवर ने बाहर निकाल कर बालक को बचाया और नाम रखा गोरिया |

     जब बालक बड़ा हुआ तो एक दिन झालराई –कालिंका ने गोलु के  सपने में आकर पूरी कहानी के साथ बताया कि वे उनके बेटे हैं | कहानी सुनते ही गोलु एक चमत्कारिक काठ के घोड़े में बैठ कर राणीघाट पहुंचे जहां सात सौत नहाने आई थी | उन्होंने सौतों को पानी में जाने से रोकते हुए कहा, “पहले मेरा घोड़ा पानी पीएगा |” सौतों ने कहा, “काठ का घोड़ा पानी कैसे पीएगा ?” जबाब, “वैसे ही पीएगा जैसे कालिंका ने ‘सिल-बट्टे’ को जन्म दिया था |” सौतों को अपनी करतूत याद आ गयी | गोलु ज्यु सौतों को राजा के पास ले गए और पूरी कहानी बताई तो कालिंका के स्तनों से दूध की धार बहने लगी | तब गोलु ज्यु का नाम दूदाधारी पड़ गया |  राजा ने सौतों को मौत की सजा सुनाई जिसे गोलु ज्यु ने ‘देश निकाले’ में बदलवा दिया |

     जब गोलु ज्यु राजा बने तो वे प्रजा के दुःख दूर करने में लग गए | उन्होंने भ्रष्टाचार, अन्याय, गरीबी और अराजकता दूर की | वे जन हित के लिए सफ़ेद घोड़े में बैठ कर जनता के बीच जाते और सब को न्याय दिलाते | वे एक प्रजापालक और न्यायविद के रूप में बहुत लोकप्रिय हुए जिस कारण लोग उनकी पूजा करने लगे | वे प्रजा के भलाई के लिए शिविर लगाते थे | जिला नैनीताल के घोड़ाखाल नामक स्थान पर वे एक दिन घोड़े सहित जल में विलीन हो गए |

      गोलु ज्यु ने जहां –जहां भी न्याय शिविर लगाए वहाँ आज भी गोलु देवता के मंदिर हैं जिनमें आज भी लोग अन्याय के विरुद्ध फ़रियाद करते हैं | उदाहरण के लिए अल्मोड़ा (चितइ), रानीखेत (ताड़ीखेत), नैनीताल (घोड़ाखाल) सहित कई जगह उनके मंदिर हैं जहां कई फरियादी जाते हैं | इनकी फ़रियाद से बेईमान या अन्यायी पर मनोवैज्ञानिक दबाव पड़ता है जिससे वह सुधरने का प्रयास करता है |

       ग्रामीण आँचल में स्थानीय देवों के ही बहुत थान-मंदिर हैं जिनकी पूजा में जगरिये -डंगरिये अंधविश्वास का जमकर तड़का ( जिसमें पशु बलि भी है ) लगा कर सुरा- शिकार की जुगलबन्दी का लुत्फ़ उठा रहे हैं | श्रद्धा होना अच्छी बात है परन्तु अन्धश्रधा ठीक नहीं हैं | किसी आम व्यक्ति में अमुक देव का अवतार होना या नाचना एक भ्रम है क्योंकि इनके कथन में कोई जिम्मेदारी नहीं होती | कई विदुजन और शोध कर्ता इन डंगरियों को देव नर्तक कहते हैं । वांच्छित परिणाम नहीं मिलने पर ये लोग भाग्य या कर्मरेख या कर्मगति कह कर पल्ला झाड़ लेते हैं | कहीं पर तीर- तुक्का लग जाता है | अत: भगवान की पूजा एक निराकार की तरह होनी चाहिए तथा किसी के झांसे में किसी चमत्कार की उम्मीद नहीं करनी चाहिए |  श्रीकृष्ण का कर्म संदेश हमें स्मरण करना चाहिए |

         हवन करने से बारिश नहीं होती | अगर हवन से बारिश होती तो देश में कहीं भी फसल चौपट नहीं होती और न रेगिस्तान बनते | हवन गृह - वातावरण शुद्धि में प्रतीक के तौर पर होना अच्छी बात है । डंगरियों ने अपनी करामात देशहित में दिखानी चाहिए और उग्रवाद पर चुनौती के साथ नियंत्रण करना चाहिए जो आए दिन हमारे सुरक्षाकर्मियों पर गोली चला रहे हैं, उन्हें शहीद कर रहे हैं  | मुशर्रफ अपनी बेगम के साथ ताजमहल के सामने बैठ कर फोटो खिचवा गया और वापस जाकर उसने कारगिल काण्ड (1999) किया जिसमें हमारे 517 सैनिक शहीद हुए | बभूत का एक फुक्का इन डंगरियों-जगरियों और तांत्रिकों ने उस कपटी पर क्यों नहीं मारा ? वर्तमान में उत्तराखंड सहित पूरा देश (विश्व भी) कोरोना संक्रमण से ग्रसित है । इस त्रासदी में भी किसी ने कोई चमत्कार नहीं किया जबकि देश में 1.52 लाख और उत्तराखंड में इस रोग से 1.6 हजार से अधिक लोग चल बसे । अतः भगवान ग्वेल ज्यू कि पूजा हमें स्वयं आत्मसंतुष्टि के लिए करनी चाहिए जैसे हम अन्य देवी/देवताओं की करते हैं । मुझे आज तक श्री राम, परशुराम, सीता, द्रौपदी या कृष्ण का डंगरिया भी नहीं मिला जिनकी हम पूजा करते आ रहे हैं या जिन्हें हम अपना आदर्श मानते आ रहे हैं और मानते रहेंगे ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
20.01.2021

Monday, 18 January 2021

Bahoo kahana se आएगी : बहू कहां से आएगी

खरी खरी - 776 : बहू कहां से आएगी ?

लड़की को है मार रहे
देना पड़े जो दहेज,
बेटा मेरा खाएगा जो
रखा है मैंने सहेज,

रखा है मैंने सहेज
बहू संग मौज करेगा,
वो भी तो कुछ लाएगी
घर उससे भरेगा,

कह 'पूरन' गुर्राए
मारे जोर से नड़की,
बहू कहां से आएगी
जब मारे तू लड़की ?

पूरन चन्द्र काण्डपाल
19.01.2021

Sunday, 17 January 2021

Ram Chandra ka poora Sach : का पूरा सच

खरी खरी - 775  :  'राम चन्द्र' का 'पूरा सच' के साथ हिम्मत को सलाम (एक नहीं भूलने वाली घटना )

      पाखंडी बाबा के वेश में अध्यात्म का आडम्बर ओड़े , पाखंडी प्रवचन से गुमराह करने वाला जो बलात्कारी अब 20 वर्ष की जेल में अपने कुकृत्यों के फल भोग रहा है उसका यह कुकृत्य दबा ही रह जाता यदि एक साहसी पत्रकार राम चन्द्र छत्रपति 2002 में अपने सांध्यकालीन सिरसा से छपने वाले हिंदी अखबार 'पूरा सच' में उस गुमनाम पत्र को नहीं छापता जो एक यौन शोषित साध्वी ने लिखा था । इस गुमनाम पत्र ने डेरा सच्चा सौदा की गुफा में हुए कुकृत्य, बलात्कार और कई साध्वियों के यौन शोषण को उजागर किया था । ज्योंही पत्र अखबार में छपा पत्रकार राम चंद्र छत्रपति को धमकियां मिलने लगी और 24 अक्टूबर 2002 को उन्हें दो हत्यारों ने उनके घर के आंगन में गोली मार दी जिससे 21 नवम्बर 2002 को उनकी अस्पताल में मृत्यु हो गई ।

     इस गुमनाम पत्र के आधार पर पंजाब- हरयाणा उच्च न्यायालय ने सेसन जज सिरसा से इस संबंध में रिपोट मांगी और रिपोट मिलते ही 24.09.2009 को इस केस की सीबीआई जांच के आदेश दे दिए । यह केस पूरे पन्द्रह वर्ष चला । यह मामूली लड़ाई नहीं थी । यह एक दीये की तूफान से लड़ाई थी जिसे दिवंगत पत्रकार के पुत्र अंसुल छत्रपति और दो गुमनाम साध्वियों ने जान की परवाह नहीं करते हुए अंत तक लड़ा जबकि देश का पूरा राजनैतिक तंत्र और सिस्टम अपने वोट बैंक के खातिर एक पाखंडी की वंदना करता रहा ।

     जब तीन साल पहले उस पाखंडी को सजा मिली तो पूरे देश ने राहत महसूस की है । आज पूरा देश उन दो गुमनाम साध्वियों, साहसी दिवंगत पत्रकार राम चन्द्र छत्रपति, उच्च न्यायालय के जस्टिस गोयल, सीबीआई के पुलिस सुपरिंटेंडेंट सतीश डांगर, अंसुल छत्रपति के साथ ही पाखंडी को सजा देने वाले जस्टिस जगदीप सिंह की हिम्मत, श्रम और निष्पक्षता को सलाम करता है, प्रणाम करता है और नमन करता है । अपनी जान की परवाह नहीं करने वाले दिवंगत पत्रकार राम चन्द्र छत्रपति को विनम्र श्रद्धांजलि देते हुए हम उनकी हिम्मत को भी प्रणाम करते हैं ।

     देर- सबेर न्याय की एक औऱ जीत हुई जब मुख्य अपराधी बाबा सहित तीन अन्य को पत्रकार हत्या केस में आजीवन कारावास की सजा मिली । एक ओर जहां भीड़ तंत्र ने हमारे सिस्टम और राजनीति को बौना बनाया वहीं हमारे न्याय तंत्र ने एक पाखंडी को सलाखों के पीछे पहुंचाया । एक दुष्कर्मी और हत्यारे की करतूत को न्याय तक पहुंचाने वाले इन सभी साहसी वीरों, न्याय और ईमानदारी के पहरुओं को एक बार पुनः नमन । देश के कई राज्यों में आज भी महिला अपराध का नाग फन फैलाए हुए है जिसे कुचलने में हमारे तंत्र को अधिक चुस्ती दिखाने की जरूरत है ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
18.01.2021

Saturday, 16 January 2021

Gairsain Rajdhani : गैरसैण राजधानी

खरी खरी - 774 : गैरसैण नहीं बनी, अमरावती बन गई

       देश का नया राज्य तेलंगाना 2 जून 2015 को घोषित हुआ । इसकी राजधानी हैदराबाद घोषित हुयी । आंध्रा के लिए नयी राजधानी अमरावती तय हुयी जिसका निर्माण कार्य जोरों पर है । हमारे राज्य को बने हुए 20 वर्ष हो गए । इस दौरान यहां 8 मुख्यमंत्री बने परंतु राजधानी गैरसैण तय होने के बाद भी अभी तक देहरादून में अटकी है । अभी तक गैरसैण को पूर्ण राजधानी घोषित भी नहीं किया गया है, केवल ग्रीष्म कालीन की बात हुई है । तेलंगाना में 11 अक्टूबर 2016 को 21 नए जिले भी अस्तित्व में आ गए हैं । उत्तराखंड में 4 जिले घोषित हुए एक अरसा बीत गया परंतु अस्तित्व अभी दूर है । हम कुछ तो तेलंगाना-आंध्र प्रदेश से सीखें । हमें शायद बुसिल ढुंग इसीलिये कहने लगे हैं लोग ।

      क्या गैरसैण पूर्ण राजधानी के लिए एक आंदोलन की आवश्यकता पड़ेगी ? उनका सिंगल इंजन और इनका डबल इंजन शक्तिहीन हो गए हैं । राजधानी की कोई बात ही नहीं करता । अब जनता को सोचना है । पलायन रोकने और उत्तराखंड में विकास को गति देने के लिए राजधानी का गैरसैण कूच नितांत आवश्यक है । राज्य आंदोलन के 42 शहीदों ने भी राजधानी गैरसैण ही तय की थी और इसके लिए अपना बलिदान दिया था । पलायन से विगत 10 वर्षों में करीब 5 लाख लोग राज्य से पलायन कर गए । गैरसैण पूर्ण राजधानी बनती तो पलायन अवश्य थमता । 2019 का चुनाव  भी 'राजधानी गैरसैण' बनाने का मुद्दा नहीं बन सका । अब राज्य चुनाव की खुसर - फुसर होने लगी है । इस बार पूर्ण राजधानी का मुद्दा बने । उत्तराखण्डियों की एक बेहतरीन राज्य की कल्पना सपने में ही रह गई । कब बसंत आएगा गैरसैण के लिए ?

पूरन चन्द्र काण्डपाल
17.01.2021

Friday, 15 January 2021

Kaai kamai : काइ कमै

खरी ख़री - 773 : काइ कमै वापिस ल्यौ

काइ कमै करनै करनै
भरी गईं स्विस बैंक,
देश क धन विदेश छिरिकी गो
न्हैगो भरि भरि टैंक,

न्हैगो भरि भरि टैंक
यां धरुहैं जागि नि छी,
काव् धन येतू है गोछी
विकि समाव को करछी,

कूंरौ 'पूरन' लगौ जुगत
वापिस ल्यौ एक एक पाइ,
देश लुटणियां कैं जेल भेजो
कब्जै ल्यो कमै जो काइ ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
16 .01. 2021

Thursday, 14 January 2021

Sena Diwas : सेना दिवस

मीठी मीठी - 556 : 15 जनवरी, सेना दिवस

     जनवरी 15, आज के दिन 1949 में भारतीय सेना के कमांडर इन चीफ जनरल के एम करिअप्पा बने थे । वर्तमान चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ जनरल मनोज मुकुंद नरवणे (पीवीएसएम, एवीएसएम ) सेना के 28वें COAS हैं । तब से प्रतिवर्ष 15 जनवरी को सेना दिवस मनाया जाता है । इस वर्ष 73वां सेना दिवस मनाया जा रहा है ।  एक बार जो सैनिक बन जाता है वह हमेशा ही अपने को सैनिक समझता है । वह सेना के नाम, नमक और निशान को सदैव दिल में संजोए रखता है । ऐसा सभी पूर्व सैनिक सोचते हैं । मुझे वह क्षण याद आता है जब आज से 50 वर्ष पूर्व हमने अपने साथियों के साथ 3 दिसंबर से 16 दिसंबर 1971 तक 14 दिन की लड़ाई में पश्चिमी और पूर्वी सीमा पर दुश्मन से घुटने टिकवाये थे । 16 दिसंबर को बांग्लादेश दुनिया के नक्शे में भारत ने ही जोड़ा । तब मेरी उम्र 23 वर्ष थी । इस युद्ध में जीत के बाद राष्ट्र ने युद्ध में भाग लेने वाले सैनिकों को पश्चिमी और पूर्वी स्टार प्रदान किये थे । उस पश्चिमी स्टार को देखकर उन क्षणों की याद ताजा कर लेता हूँ । फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ और पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न श्रीमती इंदिरा गांधी का स्मरण भी अपने आप हो जाता है ।  सेना दिवस के अवसर पर आप सभी को शुभकामनाएं और शहीद सैनिकों को विनम्र श्रद्धांजलि ।

पूरन चन्द्र कांडपाल
15 जनवरी 2021

Wednesday, 13 January 2021

Uttraini/Makraini/Makar Sankranti उत्त रैणी/मक रैणी/मकर संक्रांति

बिरखांत- 353 : उतरैणी/मकरैणी/मकर संक्रांति/उतरायण (उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत)

    प्रतिवर्ष 14 जनवरी को उतरैणी /मकरैणी/मकर संक्रांति उत्तराखंड सहित देश के कई राज्यों में बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है | पौराणिक मान्यता के अनुसार इस दिन पृथ्वी मकर राशि में प्रवेश करती है जो एक खगोलीय घटना है जिसे ‘संक्रमण’ या ‘संक्रांति’ कहा जाता है | इस दिन से ही शिशिर ऋतु का माघ महीना आरम्भ होता है | यह त्यौहार पूरे देश में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है | उत्तराखंड में ‘उतरैणी’ या ‘मकरैणी’ या ‘मकर संक्रांति’ के नाम से, असम में ‘बीहू’, हिमाचल-जम्मू- कश्मीर- पंजाब में लोहड़ी, बंगाल में ‘संक्रांति’, तमिलनाडु में ‘पोंगल’, उत्तरप्रदेश में ‘संकरात’, बिहार-पूर्वी उत्तरप्रदेश में ‘खिचड़ी’, गुजरात में ‘उतरायण’, ओडिशा में ‘मित्रपर्व’, तथा महाराष्ट्र में ‘तिलगुड़’ आदि |

       इस दिन लोग नदियों में किये गए स्नान को पुण्य मानते हैं और पाप कटने की बात करते हैं | केवल स्नान करने से पुण्य कैसे मिल जाएगा और पाप कैसे कट जाएगा, यह एक श्रध्दा की बात है | पाप तो तब कटेगा जब उसका प्रायश्चित हो और उस पाप कर्म की पुनरावृति नहीं हो | पुण्य तब मिलेगा जब हम नदी में कारसेवा (श्रमदान) करके नदी की गन्दगी साफ़ करेंगे | यहाँ तो हम नदी में वह सब कुछ डाल आते हैं जिसकी हमें जरूरत नहीं है | स्वर्ण मंदिर अमृतसर में भी लोग स्नान करते हैं परन्तु कारसेवा से तालाब की मिट्टी भी निकालते हैं | हम जहां भी गए गन्दगी डाल आते हैं | विश्व के सबसे ऊँची चोटी ऐवरेस्ट में भी कूड़े के ढेर हमारे पर्वतारोहियों और शेरपाओं ने ही डाले  हैं |

     मकर संक्रांति के दिन देश में कई नदियों के किनारे या पड़ाओं में मेले लगते हैं | उत्तराखंड के बागेश्वर में गोमती-सरयू नदियों के संगम पर इस दिन बहुत बड़ा मेला लगता है जिसमें मुख्य तौर से स्थानीय वस्तुओं का व्यापार होता है | साथ ही कई प्रकार के सांस्कृतिक आयोजन भी होते हैं जिनमें स्वतंत्रता आंदोलन में उत्तराखंडियों की भागीदारी को प्रदर्शित किया जाता है । उतरैणी के अवसर पर उत्तराखंड में कौवों को पक्वान खिलाएं जाते हैं क्योंकि शीतकाल में भी कौवा उत्तराखंड से पलायन नहीं करता । यह त्योहार उत्तराखंडियों के पक्षी-पर्यावरण प्रेम को भी दर्शाता है ।

      बागेश्वर मेले से ही उत्तराखंड में व्याप्त ‘छुआछूत’ के उन्मूलन का श्रीगणेश भी हुआ | जो लोग ‘छुआछूत’ के पोषक थे उनके बारे में अन्य लोग कहते थे, “खणी- निख़णी आब बागसर देखियाल”, अर्थात खाने- नहीं खाने वालों का पता बागेश्वर में लगेगा जहां अलग से कुलीन रसोई की व्यवस्था नहीं होती | उतरैणी के दिन कौवे को बुला बुला कर भोजन भी कराया जाता | शीत काल में इस पक्षी को बचाने का यह एक पर्यावरण से जुड़ा सरोकार है |

      बागेश्वर उतरैणी मेले का स्वतंत्रता आन्दोलन में भी बहुत बड़ा योगदान है | “लड़ाइ लड़ी जब देशल आजादीकि उत्तराखंडी पिछाड़ी नि राय, फिरंगियों कैं यस खदेड़ौ उनूल भाजनै पिछाड़ी नि चाय”, (जब देश ने आजादी की लड़ाई लड़ी तो उत्तराखंडी पीछे नहीं रहे | उन्होंने अंग्रेजो को ऐसे भगाया कि उन्होंने ने भागते हुए पीछे नहीं देखा | ) बागेश्वर में 13 जनवरी 1921 को उतरैणी के दिन अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर के सामने कुमाऊं केसरी बद्री दत्त पांडे जी के कहने पर ‘कुली बेगार’ के सभी रजिस्टर वहाँ सरयू -गोमती के संगम में बहा दिए गए |

      इस तरह उत्तराखंड में ‘कुली बेगार’ (बिना पारिश्रमिक दिए जोर-जबरदस्ती वहाँ के लोगों से बोझा/ डोली/ कमोड उठवाना) के कलंक का अंत हुआ | अंग्रेजों के जुल्म की कभी ख़त्म नहीं होने वाली व्यथा बहुत लम्बी है | इसे सांस्कृतिक आयोजनों में दिखाया जाना चाहिए ताकि भावी पीढ़ी को भी उत्तराखंडियों द्वारा देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ी गई लड़ाई का ज्ञान हो और उससे प्रेरणा मिले । दिल्ली के बार्डरों पर अपनी मांगों को लेकर किसान इस हाड़ कपाने वाली ठंड में डटे हैं जिनके आंदोलन का आज 50वां दिन है । अन्नदाता कृषक के बारे में सोचते हुए सरकार ने इस मुद्दे को शीघ्र सुलझाना चाहिए ।  इस वर्ष कोविड - 19 से देश में 1.51 लाख लोगों का दुखद अंत हुआ । उन दिवंगतों को विनम्र श्रद्धांजलि तथा व्यथित परिजनों के प्रति विनम्र सहानुभूति । बसंत पुनः आएगा तथा  वैज्ञानिकों के अथक प्रयास से वैक्सीन आने की उम्मीद बंधी है । इसी आशा के साथ सभी मित्रों को उत्तरैणी/मकरैणी/मकर संक्रांति की शुभकामनाएं ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
14.01.2021