Monday, 7 December 2020

Jugadbaji ka rog : जुगाड़बाजी का रोग

खरी खरी - 750 : जुगाड़बाजी का रोग 

     कुछ महीने पहले हमने एक रामलीला में लक्ष्मण - परशुराम संवाद देखा । दोनों  ही स्थानीय कलाकार थे । परशुराम का पात्र लक्ष्मण के पात्र से उम्र में कुछ बड़ा था और लक्ष्मण से अच्छा कलाकार भी था । रामलीला में संवाद के बाद मंच से इनाम की घोषणा हुई तो लक्ष्मण को एक हजार रुपए और परशुराम को दो सौ रुपए का इनाम बताया गया । परशुराम के पात्र का अभिनय लक्ष्मण से अच्छा था फिर लक्ष्मण को इनाम अधिक क्यों मिला होगा ? खोजबीन करने पर पता चला कि इनाम देने वाले आठ लोग लक्ष्मण के रिश्तेदार थे जो एक एक सौ रुपया लक्ष्मण को दे गए जबकि दो अनजान लोगों ने एक एक सौ रुपए लक्ष्मण और परशुराम दोनों को इनाम दिए । स्पष्ट है इनाम कला को नहीं बल्कि रिश्तेदार को दिया गया ।

       इस इनाम को देखकर मुझे कई वर्ष पहले देखी गांव की रामलीला याद आ गई । यहां भी लक्ष्मण का पात्र इनाम के जुगाड़ में ही रहता था । उसने अपने गांव के एक सहपाठी को कहा, "सुन, मैं तुझे चांदी का एक पदक देता हूं । तू आज रामलीला में लक्ष्मण - परशुराम संवाद के बाद यह पदक मुझे इनाम में दे देना । मंच से घोषणा होने पर तेरा भी नाम हो जाएगा और मैं उत्तम पात्र घोषित हो जाऊंगा ।" लक्ष्मण का वह सहपाठी बोला, " देख यार हम गरीब लोग हैं । बड़ी मुश्किल से घर में चूल्हा जलता है । जब मेरे नाम से चांदी का पदक लक्ष्मण को इनाम दिए जाने की घोषणा होगी तो लोग सोचेंगे कि इस फटेहाल गरीबी में ये लड़का पदक कहां से लाया होगा ? मुझ से यह काम नहीं होगा । तू मुझे दो रुपए दे, एक तुझे और एक परशुराम को इनाम में दे दूंगा । एक के बजाय दोनों को इनाम देना अच्छा रहेगा । भौनिका (परशुराम ) भी बहुत अच्छे पात्र हैं । मैंने उनको तालिम में देखा है । गजब का पाट खेलते हैं वे । लक्ष्मण ने दो रुपए देने से मना कर दिया ।

       लक्ष्मण की महत्वाकांक्षा कम नहीं हुई । उसने पदक इनाम देने के लिए दूसरे गांव के एक अन्य व्यक्ति को पटा लिया । इसका पता तब चला जब रात को रामलीला में लक्ष्मण - परशुराम संवाद के बाद मंच से लक्ष्मण के पात्र को चांदी का एक पदक इनाम स्वरूप घोषित हुआ । लोग कह रहे थे, "यार ऐकटींग तो परशुराम की लक्ष्मण से अच्छी थी । पदक देने वाले ने भाईबंदी करी है । परशुराम को भी पदक देता तो ठीक होता । यह लक्ष्मण का जुगाड़ हो सकता है वरना चांदी का मैडल उसके बजाय परशुराम को मिलना चाहिए था ।"

        आज भी हमारे सामने इस तरह के कई जुगाड़ू लक्ष्मण हैं जो जहां - तहां जुगाड़बाजी से इनाम या पुरस्कार झटक लेते हैं और पुरस्कार के वास्तविक हकदार देखते रह जाते हैं । लोग इन चाटुकार - जुगाड़बाज लक्षमणों को अब बखूबी पहचानने भी लगे हैं क्योंकि लोगों को बगुलों और हंसों की पहचान एक न एक दिन देर - सवेर हो ही जाती है । बगुला हंस बनकर कितने दिन तक घूम सकता है ?   इस तरह के जुगाड़ बाज लक्ष्मण अपने घर के शीशे के सामने भी खड़े नहीं हो सकते क्योंकि शीशा बोलता है, "मेरे सामने खड़े होने की तेरी हिम्मत कैसे हुई ? तू मुर्दा जमीर वाला जिंदा जुगाड़ू है ।" जुगाड़बाजी का रोगी कभी किसी से नजर नहीं मिला सकता । इन रोगियों को अपना भेद खुलने का डर सताते रहता है । झूठ के पैर नहीं होते । सच्चाई और ईमानदारी के सामने झूठ और फरेब कभी टिक नहीं सका है । जुगाड़बाजी के चेहरे देर - सवेर एक दिन बेनकाब हो ही जाते हैं ।

पूरन चन्द्र कांडपाल


08.12.2020


Sunday, 6 December 2020

Sashstr sena flag day : सशस्त्र सेना झंडा दिवस

मीठी मीठी - 540 :  आज 7 दिसम्बर सशस्त्र सेना झण्डा दिवस

        दिसम्बर महीने की 7 तारीख को प्रतिवर्ष (7 दिसम्बर 1949 से ) सशस्त्र सेना झंडा दिवस मनाया जाता है । इस अवसर पर लोगों से दान स्वीकार किया जाता है । दान की यह राशि सशस्त्र सेना के कल्याण हेतु खर्च किया जाता है । देश की सुरक्षा में दिन -रात जुटी हमें अपनी सशस्त्र सेना पर गर्व है । हमें अपनी सशस्त्र सेना के शौर्य, पराक्रम और बलिदान का निरंतर स्मरण करते रहना चाहिए और उनके परिवारों के प्रति सम्मान प्रकट करना चाहिए । सभी को सशस्त्र सेना झंडा दिवस की शुभकामनाएं । देश के सशस्त्र सैन्य बल के सम्मान में कुछ पंक्तियां समर्पित हैं -

हिन्द के सैनिक तुझे प्रणाम,
सारी मही में तेरा नाम,
दुश्मन के गलियारे में भी,
होती तेरी चर्चा आम |

गुरखा सिक्ख बिहारी कहीं तू,
कहीं तू जाट पंजाबी,
कहीं कुमाउनी कहीं गढ़वाली,
कहीं मराठा मद्रासी |

कहीं राजपूत डोगरा है तू,
कहीं महार कहीं नागा,
शौर्य से तेरे कांपे दुश्मन,
पीठ दिखाकर भागा |

नहीं हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई,
तू है हिन्दुस्तानी,
मातृभूमि पर मर मिट जाए,
ऐसा अमर सेनानी |

मात-पिता पत्नी बच्चे
रिश्तेदार या घर संसार,
आंख के आगे ये नहीं होते
सामने जब करतब का भार ।

दम निकला तूने आह न की
सीने में गोली खाई,
रखा बुलंद तिरंगा प्यारा
अपनी कसम निभाई ।

तेरी कुर्बानी के चर्चे
मन में लिए समाए,
प्रज्ज्वल अमर जवान ज्योति पर
मस्तक राष्ट्र झुकाए ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
07.12.2020

Saturday, 5 December 2020

Gharwai kain lai khawau : घरवाइ कैं लै खवाै

मीठी मीठी -538 : घरवाइ कैं लै खवाै

म्यार पड़ोसक चनरदा 

घरवाइ-भक्ति पैलिकै बै करैं रईं,

ऑफिस बै आते ही चट्ट

रसोइ में घुसी जां रईं ।

पिसी लै वलि दिनी

भान लै खकोइ दिनी,

घरवाइ दगै ठाड़ है बेर

साग लै खिरोइ दिनी ।

एक दिन उं रसोइ में

भौत व्यस्त है रौछी,

मी भ्यार बै ठाड़ है 

बेर उनुकैं चै रौछी ।

मील कौ हो किलै आज

मालिक्याण कां जैरीं,

जो तुमार हूं एकलै

फान फुताड़ लैरीं।

अरे यार वीकि मुनाव 

पीड़ हैरै, अलै आंख लैरीं,

नान रवाट खणा लिजी

टकटकै बेर चैरीं ।

मील कौ यार नना हूं

किलै आपूं हैं लै पकौ,

द्वि रवाट तुम लै खौ

और बीमार कैं लै खवौ ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल

06.12.2020

Friday, 4 December 2020

Jindagi ki jung : जिंदगी की जंग

खरी खरी - 749 : चुनाव भी : जिंदगी की जंग '

प्रजातंत्र में चुनाव भी
'जिन्दगी की जंग'
का हिस्सा है।
एक मित्र के पूछने पर कि
वोट किसको देगा ?
दूसरे मित्र ने बताया,
"यार एक वोट है,
क्या करना है जहां
मन करेगा बटन दबा दूंगा।
मैं इस बारे में ज्यादा
गंभीरता से नहीं सोचता ।"

मित्र का यह उत्तर उचित
नहीं है। प्रजातंत्र में ही वोट
का अधिकार मिलता है ।
जीतने वाले ही हमारे
भविष्य की नीतियां बनाते हैं ।
आप भलेही किसी दल या
व्यक्ति को वोट करें परन्तु
बड़ी गम्भीरता से सोच-
विचार कर, मन बनाकर
बड़े उत्साह से वोट करें।

चुनावी जंग में सुनें
सबकी, करें अपने मन की ।
चुनाव में वोट अवश्य करें
परन्तु सोच- समझकर
वोट करें क्योंकि इस
एक वोट के साथ हमारी
'जिंदगी की जंग' भी जुडी़ है ।

( 10 दिन हो गए, विगत 23 नवम्बर 2020 से दिल्ली में भी 'जिंदगी की जंग' लड़ी जा रही है, हां किसानों द्वारा दिल्ली की सड़कों पर । तू जिंदा है तो जिंदगी में जीत की यकीन कर ...। )

पूरन चन्द्र कांडपाल
05.12.2020

Thursday, 3 December 2020

Nausena diwas : नौसेना दिवस

मीठी मीठी - 538  : नौसेना दिवस की शुभकामनाएं

      आज 4 दिसम्बर 'भारतीय नौसेना दिवस' के उपलक्ष्य में देश की नौसेना को हार्दिक शुभकामनाएं एवं जयहिन्द । 4 दिसम्बर 1971 को हमारी नौसेना ने पाकिस्तान के कराची नेवल बेस को ध्वस्त किया था । यह उस युद्ध की जीत के जश्न के बतौर मनाया जाता है ।

हिन्द के सैनिक तुझे प्रणाम,
सारी मही में तेरा नाम,
दुश्मन के गलियारे में भी,
होती तेरी चर्चा आम |

गुरखा सिक्ख बिहारी कहीं तू,
कहीं तू जाट पंजाबी,
कहीं कुमाउनी कहीं गढ़वाली,
कहीं मराठा मद्रासी |

कहीं राजपूत डोगरा है तू,
कहीं महार कहीं नागा,
शौर्य से तेरे कांपे दुश्मन,
पीठ दिखाकर भागा |

नहीं हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई,
तू है हिन्दुस्तानी,
मातृभूमि पर मर मिट जाए,
ऐसा अमर सेनानी |

मात-पिता पत्नी बच्चे
रिश्तेदार या घर संसार,
आंख के आगे ये नहीं होते
सामने जब करतब का भार ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
04.12.2020

Wednesday, 2 December 2020

Gantuon ke तुक्के : गणतुओं के तुक्के

बिरखांत – 346 : गणतुवों (पुछारियों) के तुक्के

   अंधविश्वास की जंजीरों में बंधा हमारा समाज गणतुवों या पुछारियों के झांसे में बहुत जल्दी आ जाता है | लोग अपनी समस्या समाधान के लिए गणतुवों के पास आते हैं या भेजे जाते हैं | कभी- कभार उनका तुक्का लग जाता है तो उनके श्रेय का डंका पिटवाया जाता है | तुक्का नहीं लगने पर भाग्य- भगवान्- किसमत –नसीब -करमगति कह कर वे पल्ला झाड़ देते हैं |

     विगत कुछ वर्ष पहले दिल्ली महानगर में ऐसी ही एक घटना घटी | मेरे एक व्यक्ति का उपचाराधीन मानसिक तनाव ग्रस्त युवा पुत्र अचानक दिन में घर से बिन बताये चला गया | इधर -उधर ढूंढने के बावजूद जब वह देर रात तक घर नहीं आया तो थाने में उसकी रिपोट लिखाई गई | इस तरह परिवार का पहला दिन रोते-बिलखते बीत गया | दूसरे दिन प्रात: किसी मित्र के कहने पर पीड़ित माता- पिता गणत करने वाली एक महिला (पुछारिन) के पास गये | पुछारिन बोली, “आज शाम से पहले तुम्हारा बेटा  घर आ जाएगा | वह सही रास्ते पर है, सही दिशा पर चल रहा है | तुम बिलकुल भी चिंता मत करो |”

     उसी रात थाने से खबर आती है कि आपके बताये हुलिये के अनुसार एक लाश अमुक अस्पताल के शवगृह (मोरचुरी) में है  | परिजन वहां गए तो मृतक वही था जो घर से गया था | चश्मदीदों ने बताया कि यह व्यक्ति उसी दिन (अर्थात गणत करने के पहले दिन ) रात के करीब साड़े नौ बजे दुर्घटनाग्रस्त होकर बेहोशी हालत में पुलिस द्वारा अस्पताल लाया गया | उसकी मृत्यु लगभग तभी हो गयी थी | दस-ग्यारह घंटे पहले मर चुके व्यक्ति को पुछारिन ने बताया कि ‘वह  सही दिशा में चल कर घर की ओर आ रहा है’ |

      इस धंधे के लोग किस तरह समाज को बरगलाते हैं, यह एक उदाहरण है | यदि पुछारिन के पास कुछ भी ज्ञान होता तो वह कह सकती थी ‘वह व्यक्ति घोर संकट में है या परेशान है, अड़चन में फंसा है |’ पोस्टमार्टम और अंत्येष्टि के बाद पुछारिन को जब यह दुखद समाचार भिजवाया गया तो उसने ‘भाग्य -भगवान्- किसमत- नसीब- करम -परारब्ध- ब्रह्मलेख’ आदि शब्दों को दोहरा दिया | यदि वह व्यक्ति जीवित आ जाता तो यह पुछारिन महिमामंडित हो जाती जबकि उससे आज ‘तूने तो ऐसा बताया था’ पूछने वाला कोई नहीं है | 

     सच तो यह है कि दोषी हम हैं जो इस प्रकार के तंत्रों के जाल में फंसते हैं और कभी सही तुक्का लगने पर इनकी वाह-वाही का डंका पीटते हैं | कब जागेगा तू इंसान ? किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को महिमामंडित नहीं करने से हम समाज में सुधार ला सकते हैं | चर्चा तो कर ही सकते हैं ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
03.12.2020

Tuesday, 1 December 2020

Hamaar neta aur kisaaan : हमारा नेता और किसान

खरी खरी - 748 : हमार नेता और किसान

अघिल -पिछाड़ि नेता हमूकैं भुलि जानी


चुनाव क टैम गिड़गिड़ानै ऐ जानी,


हात जोड़नी इजा - बाबू कै जानी


वोट पड़ते ही पुठ देखै न्है जानी ।

यूं मुख में राम राम बगल में छुर धरनी


जाड़ काटी नि देखिन टुक सुकिये देखिनी,


इनरि खाल लै मोटि हैं निबुड़न तीर


यौ मनखियौ क रूप छ बिना जमीर ।

उम्मीद निछोड़ण चैनि वोट दिण पड़ल


कभैं त क्वे माई च्यल जरूर पैद ह्वल,


जो वोट दिणियांक नजर में खर उतरल


वोट- चुनाव और प्रजातंत्र कि लाज धरल ।

अघिल पिछाड़ि किसानों कि बात हिंछ


ऐन मौक पर उनरि बात नेता नि सुणन,


नेता कूंरीं किसान भैम -भड़कूण में ऐ गईं


पर देशाक सबै किसान गलत नि है सकन। 

पूरन चन्द्र काण्डपाल


02.12.2020