Thursday, 8 October 2020

Kabhain aapoonhoon puchho :कभैं आपूहूं पु्छो

खरी खरी - 709 : कभैं आपूहैं पुछो !!

भाग्य क भरौस पर
तमगा नि मिलन
पुज-पाठ भजन हवन ल
मैदान नि जितिन ।

पसिण बगूण पड़ूं
जुगत लगूण पणी,
कभतै हिटि माठु माठ
कभतै दौड़ लगूण पणी ।

हाम यौस करण चैं कै दिनू
करि बेर नि देखून,
भाषण एक दुसरै कैं दिनूं
चलि बेर नि देखून ।

औरों हैं पुछण है पैली
आपूं हैं पुछो,
आफी सवाल करो
आफी जबाब ढूंढो ।

नै हमूल नशेणियां कैं टमकाय
नै शराबियों कैं रोक,
नै कभैं गुट्क तमाकु खै बेर
थुकणियां कैं टोक ।

मैंसूं देखादेखि हाम शिवजी कैं
भांग - धतुर चढ़ाते रयूं,
अंधविश्वास क नागौर
सबूं दगै बजाते रयूं ।

दुनिय विसर्जना क नाम पर
कुड़कभाड़ नदियों में बहाते जांरै,
मूर्ति फोटो कलेंडर पुज
हवन क शेष,
सब नदियों में घुसाते जांरै ।

नदी गंद नाव बनि गईं
पाणी गजवैन हैगो काव,
गंदगी फैलूणी कारखणा पर
आजि लै नि लाग ताव ।

गिच खोलो भू- विसर्जन कि
बात दुनिय कैं समझौ,
नदियों क हाल नि बिगाड़ो
विसर्जन वाइ चीज माट में दबौ ।

पढ़ीलेखी हाय
पढ़ी लेखियां जौस
काम नि करें राय ,
गिचम दै क्यलै जमैं थौ
आपू हैं नि पूछैं राय ।

मरि-झुकुड़ि बेर कुण नि बैठो
ज्यौना चार कभैं त जुझो,
क्यलै मरि मेरि तड़फ
क्यलै है रयूं चुप,
कभैं आपूहैं पुछो ?

पूरन चन्द्र काण्डपाल
09.10.2020

Tuesday, 6 October 2020

Kavita : कविता

मीठी मीठी - 519 : क्या है कविता ?

शब्दों की माला
बनाती है कविता
दिल के उफान को
बताती है कविता
सोए हाकिम को
जगाती है कविता
आसन पर बैठों को
हिलाती है कविता ।

बेगानों को अपना
बनाती है कविता
अपनों को ऐहसास
कराती है कविता
अपना गिरेबां
दिखाती है कविता
आदमी को इंसान
बनाती है कविता ।

राष्ट्र की धुन
हुंकारती है कविता
वीरों का शौर्य
फुफकारती है कविता
शहीदों की स्मृति
जगाती है कविता
उलझन दिलों की
सुलझाती है कविता ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
07.10.2020

Monday, 5 October 2020

Kaikeee : कैकेई

खरी खरी - 708 : एक थी कैकई

     रघुवंश के राजा अयोध्या नरेश दशरथ का पत्नी कैकई से गहन प्रेम अवर्णनीय है । पत्नी का साथ और पत्नी का प्रेम देख कर उसे दो वरदान दे दिये । कैकई बोली, "जब मन करेगा मांग लूंगी राजन, आप बचन दे दो ।'' अपनी प्रियतमा पर भरोसा था सो महाराज दशरथ ने बचन दे  दिया । भरोसा करना भी पड़ता है । उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि इस बचन की परिणीति क्या होगी ?

     आगे चलकर राम राज्याभिषेक का वक्त आया और पुत्र प्रेम में डूबी कैकई जी को उनकी परमानेंट कामवाली (आजकल मेड कह रहे हैं ) मंथरा जी ने ऐसा उकसाया कि कैकई ने अपने सर्वप्रिय कौशल्या पुत्र राम को वनवास और अपने पुत्र भरत को राजा बनाने की मांग कर डाली । दशरथ बोले, "प्यारी कैकई, मेरे प्यार के साथ विश्वासघात मत कर । मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि तू इतनी भयानक हो सकती है । अब मेरी विनती है कि भरत को भलेही राजा बना दे परन्तु निर्दोष राम को वन मत भेज ।"

         कैकई नहीं मानी, वह अपनी मांग पर अड़ी रही ।  राजा दशरथ को ऐसा सदमा लगा कि वे कौमा में चले गए और कौमा से कभी वापस नहीं आये । तत्काल उनके प्राण पखेरू उड़ गए । वे चार पुत्रों के पिता थे परन्तु मृत्यु के समय कोई भी पुत्र सामने नहीं था । कैकई की निष्ठुरता इतनी उग्र हो गई कि मरते हुए पति को देखकर भी उसका हृदय नहीं पिघला । उसकी जिद दुनिया को कुछ तो शिक्षा दे गई ।  (आगे की कहानी सब जानते हैं फिर भी मौका मिले तो रामलीला देखते रहिए ।)

      यदि कैकई चाहती तो दशरथ बच सकते थे । भरत राजा भी बन जाते और राम वन भी नहीं जाते लेकिन वह नहीं मानी । यदि दशरथ यह जानते कि कैकई इस तरह की हरकत करेगी तो वे उसे बचन नहीं देते । यह त्रेता युग की बात है । सभी विवाहित पुरुषों से निवेदन है कि अपनी पत्नी को बचन भी दें, उसको ATM का पिन नम्बर भी बतायें और उसे दशरथ से ज्यादा प्यार भी करें परन्तु उसे प्यार से या मजाक में भी कैकई न कहें, वह बुरा मान सकती है । कैकई तो सिर्फ और सिर्फ एक ही थी ।  लेकिन यह घ्यान जरूर रखें कि आपकी पत्नी के संपर्क में दूर- दूर तक ब्रेन वाश करने वाली कोई मंथरा न मंडराने पाए ।

(कृपया कथानक को पौराणिक दृष्टि से नहीं, केवल साहित्यिक दृष्टि से देखें । धन्यवाद ।)

पूरन चन्द्र काण्डपाल
06.10.2020

Dherda anpadh : शेर दा अनपढ़

स्मृति - 518 : शेरदा अनपढ़ याद ऊंनी

     3 अक्टूबर कुमाउनी भाषाक सुप्रसिद्ध कवि शेरदा  ' अनपढ़ ' ज्यूक जन्मदिन । उनार बार में  ' लगुल ' किताब बै एक लेख यां उद्धृत छ । शेरदा कैं विनम्र श्रद्धांजलि ।

पूरन चन्द्र कांडपाल
05.10.2020

Saturday, 3 October 2020

wo kali raat : वो काली रात

खरी खरी - 707 :  1 और 2 अक्टूबर की वह दरम्यानी काली रात !!

      1 और 2अक्टूबर 1994 की उस दरम्यानी रात  को जब उत्तराखंड से हमारी बहनें राज्य की मांग के लिए अहिंसक आंदोलन करने दिल्ली की गद्दी को चेताने के लिए बसों से आ रही थी तो उन्होंने सोचा भी नहीं होगा की कंस के राक्षस 2 अक्टूबर की भोर को रामपुर तिराहे पर बांगोवाली गांव के पास उनका अपमान करेंगे । उनके हाथ में उस दिन दराती भी नहीं थी अन्यथा उन नरपिशाचों के चिथड़े उड़ गए होते । उन्हें पहली बार कमर में दराती नहीं होने की कमी खली । 

    इसी तरह 1994 के राज्य आंदोलन में 42 उत्तराखंडी शहीद हो गए । इन लोगों ने आंदोलन में कूदते समय यह नहीं सोचा होगा कि आज वे शहीद हो जॉयेंगे । इनकी वीरगति से इनके घरों के दीपक बुझ गए । इनका आंदोलन भी अहिंसक था ।सोचिए क्या बीती होगी इन शहीदों के परिवारों पर । अपने लिए नहीं मरे थे ये । ये उत्तराखंड राज्य के लिए मरे ।  ये गैरसैण राजधानी के लिए शहीद हुए । इनकी जीवटता को नमन ।

        1- 2 अक्टूबर की उस काली रात को  उत्तराखंड के लिए भुलाना मुश्किल है । भूलेगा भी नहीं क्योंकि दोनों ही घटनाएं दुःखद, शर्मनाक और निंदनीय थीं । यह दिन उत्तराखंड के लिए हमेशा ही काला रहेगा क्योंकि उस रात महिलाओं के उस निरादर ने पूरे विश्व को अपनी ओर आकृष्ट किया था ।  इस दिन कुछ लोग घड़ियाली आंसू बहाते हैं जो जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है । सत्ता - सुख भोग रहे मान्यवरों को उत्तराखंड को न्याय दिलाना चाहिए । 26 वर्ष हो गए हैं, एक भी दोषी दंडित नहीं हुआ । क्यों ? यदि आप आत्मा में विश्वास रखतें हैं तो उन 42 शहीदों की आत्मा के बारे में भी सोचो । देश की 2 महान हस्तियों, गांधी -शास्त्री को 2 अक्टूबर को विनम्र श्रद्धांजलि के अलावा उत्तराखंड के लिए यह दिन काला दिवस के रूप में ही याद किया जाता है । "वैष्णव जन तो तेने कहिए... 'सबको सन्मति दे भगवान...."

पूरन चन्द्र काण्डपाल


04.10.2020


Friday, 2 October 2020

Mujaffarnagar kand : मुजफ्फरनगर कांड

खरी खरी -706 :मैं मुजफ्फरनगर कांड का शहीद बोल रहा हूं जी ।”

     राज्य बनने की 20वीं वर्षगांठ पर मैं राज्य आंदोलन में मारा गया शहीद बोल रहा हूं जी, “अलग उत्तराखंड राज्य कि मांग वर्ष 1923 में पहली बार उठी और  1952, 1956, 1968, 1973 और 1979  में यह अधिक गुंजायमान हुई | 1994 के काल खंड में इस अहिंसक मांग पर गोली चला दी गयी और आजाद हिन्द में एक राज्य की मांग पर 42 आन्दोलनकारियों को गोली का शिकार होना पड़ा | रामपुर तिराहे पर बने शहीद स्मारक से ही में एक शहीद आपको इस लम्बी कहानी को एक छोटी सी गाथा के रूप में सुना रहा हूं ।"

     "एक सितम्बर 1994  को उत्तर प्रदेश की बर्बर पुलिस ने अंग्रेजी हकूमत की तरह खटीमा में निहत्थे आन्दोलनकारियों पर गोली चलाकर आठ लोगों को मौत के घाट उतार दिया | 2 सितम्बर को मसूरी में 8  प्रदर्शनकारी मारे गये | इसके बाद पूरे उत्तराखंड के गांव, कस्बों और नगरों में अहिंसक आन्दोलन चरम पर पहुंच गया | राज्य का सभी वर्ग लेखक, पत्रकार,  गीतकार, कवि, किसान, भूतपूर्व सैनिक, विद्यार्थी,  स्त्री- पुरुष- बच्चे अपना काम-धंधा और घरबार छोड़कर सडकों पर आ गए | इस आन्दोलन का कोई केन्द्रीय नेतृत्व नहीं था | दोनों ही राष्ट्रीय राजनैतिक दल इससे अलग रहे |"

     "2 अक्टूबर 1994 को आन्दोलनकारी शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए बसों में बैठ कर उत्तराखंड से दिल्ली आ रहे थे | तब उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव थे | एक सोची-समझी चाल से उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर आन्दोलनकारियों पर नादिरशाही दमन चक्र चलाया गया | पुलिस की वर्दी पर दाग लगाने वालों ने भोर होने से पहले अचानक निर्दोषों पर आक्रमण कर दिया | लाठी-डंडे –बन्दूक का जम कर इस्तेमाल हुआ |महिलाओं के साथ  बदसलूकी  की गई जिसने सभ्यता को शर्मसार किया | गन्ने के खेतों में घसीट कर लोगों को पीटा गया । रामपुर,  सिसोना, मेदपुर और बागोवाली के लोगों ने महिलाओं की मदद की | "

     "एक महिला कह रही थी “काश ! आज मेरी कमर में दराती होती, इन भेड़ियों के मैं भुतड़े (टुकड़े) कर देती” | उत्तराखंड की नारी ने वहां पर वीरांगना लक्ष्मीबाई की तरह संघर्ष किया | पुलिस फायिरिंग में वहां पर कई शहीद हो गए और सैकड़ों घायल हुए | 3 अक्टूबर को राजधानी दिल्ली सहित पूरे उत्तराखंड में आन्दोलन और तेज हो गया जिससे देहरादून, नैनीताल और कोटद्वार में 5 लोग मारे गए | 3 नवम्बर को पूरे उत्तराखंड में काली दिवाली मनाई गयी | केवल शहीदों कि नाम पर एक दीपक जलाया गया | 15 अगस्त 1996 को तत्कालीन प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा ने लालकिले से उत्तराखंड राज्य बनाने की घोषणा कर दी और 9 नवम्बर 2000 को राज्य बन गया | तब से राज्य में 10 मुख्य मंत्री बन गए हैं । जिन पुलिस कमांडरों ने जघन्य अपराध कर 42  निर्दोषों को मारा उन्हें तरक्की मिल गई है परन्तु न आजतक  शहीदों को न्याय  मिला और न हमारे सपनों का उत्तराखंड बना |"

     "जब तक दोषियों को दण्डित नहीं किया जाएगा और राज्य की राजधानी देहरादून से गैरसैण नहीं जाएगी, हमारी आत्मा को शान्ति नहीं मिलेगी | मुझे पता है उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष मोर्चा पिछले 26 वर्षों से दिल्ली के जंतर-मंतर पर शहीदों को न्याय दिलाने के लिए प्रति वर्ष 2 अक्टूबर को अहिंसक प्रदर्शन करते आ रहा है | हमारी चिताओं पर आप मेले लगाते हैं, हमारे लिए आखें नम करते हैं, इससे कुछ शान्ति जरूर मिलती है | जय भारत, जय उत्तराखंड |” 

पूरन चन्द्र काण्डपाल


03.10.2020


Thursday, 1 October 2020

Gandhigiri aur Shashtri giri: गांधीगिरी और शास्त्री गिरी

बिरखांत - 339 : आसान नहीं है गांधीगिरी और शास्त्रीगिरी

     गांधी जी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर गुजरात में, 13 वर्ष की उम्र में कस्तूरबा से विवाह, 18 वर्ष में वकालत पढ़ने इंग्लैंड गए, 1893 में मुक़दमा लड़ने दक्षिण अफ्रीका गए, वहां रंग -भेद का विरोध किया, 7 जून 1893 को गोरों ने पीटरमैरिटजवर्ग रेलवे स्टेशन पर उन्हें धक्का देकर बाहर निकाला, 1915 में भारत वापस आए, सत्य-अहिंसा-असहयोग के अमोघ हथियार से स्वतन्त्रता संग्राम लड़ा, 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ और 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गौडसे ने उनकी ह्त्या कर दी परन्तु बापू मरे नहीं, राजघाट दिल्ली में आज भी वे  विराजमान हैं | दुनिया राजघाट आती है और ‘वैष्णव जन तो..’ भजन में बापू को महशूस करती है |

       गांधी ने जो कुछ कहा और जिस तरीके से उसका क्रियान्वयन किया उसे दुनिया ‘गांधीगिरी’ कहती है | गांधीगिरी आसान नहीं है और न यह सबके बस की है | जो लोग ‘मजबूरी का नाम महात्मा गांधी’ कहते हैं यह उनकी कुत्सित सोच है | दुनिया जानती है कि गांधी ने फिरंगी को खदेड़ा और यूनियन जैक की जगह तिरंगा फहराया | जिन्होंने ने गांधी को ट्रेन से धक्का मारा, गांधी ने उन्हें अपने देश से धक्का मारा |  दुनिया के सभी विवादों का अंत बातचीत के गांधी दर्शन के अनुसार ही समझौतों तक पहुंचता है |

        गांधी जी की सीख जिसे अब ‘गांधीगिरी’ कहा जाता है वह है- ‘गाली देने वाले की तरफ मुस्करा कर देखो--वह देर-सबेर शर्मिंदा होगा; समस्या का समाधान झगड़े से नहीं प्यार से निकालो; गुस्सा और अहंकार से दूर रहो; हिंसा में विश्वास नहीं रखो; अभद्र से भद्रता से पेश आओ; क्षमा करना कमजोर इंसान के बूते की बात नहीं है; जिन्दगी ऐसे बिताओ मानो कल ही मौत की तारीख तय है; कथनी और करनी में अंतर मत करो | गांधी ने कई बार कहा, ‘एक गलत कभी भी सच्चाई का स्थान नहीं ले सकता है भलेही उसका कितना ही प्रचार क्यों न किया गया हो | गांधी ने  यह भी कहा था, “ जब हिंसा और कायरता में से एक को चुनना होगा तो मैं  हिंसा का चुनाव करूंगा |” गांधी के ‘दूसरी गाल में थप्पड़’ और ‘ तीन बन्दर’ वाली बात का जो लोग सही विश्लेषण नहीं करते उन्हें गांधी के दर्शन को समझना और उसका पुन: मंथन करना चाहिए |

       गांधी ने छुआछूत का किस तरह विरोध किया, एक प्रसंग – एक बार गांधी जी को एक सभा में बोलना था, उसमें सफाई कर्मियों को नहीं आने दिया गया | गांधी को जब यह बात मालूम हुई तो उन्होंने सभा के आयोजकों से कहा, ‘आप लोग अपनी मालाएं और अभिनन्दन पत्र अपने पास रखिये | मैं उनके पास जाकर भाषण दूंगा | जिन्हें मेरी बात सुननी हो वहाँ आ जाए’ | गांधी जी उनके पास चले गए और आयोजकों को वहां जाना पड़ा |गांधीगिरी में बहुत दम है बस ज़रा विनम्रता से प्रयास करने की देर है | विज्ञान का युग आया, परिस्थितियां बदली परन्तु गांधीगिरी की आज अधिक जरूरत है | मेरा दावा है जो बच्चा ‘शाम- दाम- दंड- भेद’ से नहीं मानता वह गांधीगिरी से मान जाता है | किन्तु-परन्तु मत कहिये, करके देखिये |

        आज के इस पुनीत अवसर पर देश के दूसरे प्रधानमंत्री, ‘जय जवान  जय किसान’ नारे का उद्घोष करने वाले भारत रत्न लाल बहादुर शास्त्री जी जिनका जन्म 02 अक्टूबर 1904 को हुआ था, को भी हम श्रधा सुमन अर्पित करते हैं | गांधी जी की प्रेरणा से वे स्वतंत्रता संग्राम में कूदे थे और 18 बार जेल गए | वे उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री और नेहरू कबीनेट में रेल मंत्री थे | नेहरू जी की मृत्यु के बाद वे 9 जून 1964 से 11 जनवरी 1966 तक एक  वर्ष 7 महीने देश के प्रधानमंत्री रहे | उनके नेतृत्व में 1965 के युद्ध में हमारी सेना ने पकिस्तान को बुरी तरह से हराया था | आज ही हम उत्तराखंड राज्य आन्दोलन में शहीद हुए रामपुर तिराहे के शहीदों सहित राज्य आंदोलन के सभी 42 शहीदों को भी नमन करते हैं और श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं  |

( कोरोना के इस दौर में देश में संक्रमितों की संख्या 63 लाख पार कर चुकी है और 99 हजार से अधिक देशवासी इस रोग के ग्रास हो चुके हैं । बचाव से ही हम बच सकते हैं । मास्क और देहदूरी के साथ भीड़ से स्वयं को दूर रखना ही उत्तम ।)

पूरन चन्द्र काण्डपाल


02 अक्टूबर 2020