Tuesday, 7 May 2019

Alag thakuli : अलग थकुलि नि बजौ

खरी खरी - 426 : अलग थकुलि नि बजौ

देशा का मिलि गीत कौ
अलग थकुलि  नि बजौ ।

शहीदों कैं याद करो
घूसखोरों देखि नि डरो
कामचोरों हैं काम करौ
हक आपण मांगि बे रौ
अंधविश्वास गव घोटो
अघिल औ पिछाड़ि नि रौ
देशा का...

हमूकैं लडूणियां
ताक लगै बेर चै रईं
जात-धरमा नाम पर
आग लगूं हैं भै रईं
इनूं कणी घुत देखौ
आपसी भैचार बड़ौ
देशा का...

पूरन चन्द्र काण्डपाल
08.05.2019

Monday, 6 May 2019

Gairsain hunkaar : गैरसैण हुंकार

खरी खरी - 425 : सफल रही थी गैरसैण हुंकार रैली

     पिछले साल गैरसैण राजधानी मुद्दे पर राजधानी वासियों का 06 मई 2018 को  वह क्रमशः चतुर्थ मिलन था जो एक बड़ी हुंकार रैली के रूप में संसद मार्ग नई दिल्ली पर आयोजित हुआ था ।  इससे पहले 03 फरवरी  और 09 फरवरी 2018 को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया नई दिल्ली तथा 10 मार्च 2018 संसद मार्ग नई दिल्ली पर रैली आयोजित की गई थी । 06 मई 2018 की रैली में आशा के अनुरूप बहुत लोग आए थे । रैली में राजधानी के विभिन्न क्षेत्रों से लोग पहुंचे जिसमें उत्तराखंड की नारीशक्ति भी मौजूद थी । इस रैली का आयोजन 'उत्तराखंड एकता मंच दिल्ली'  (एकजुट- एकमुठ) के तत्वाधान में किया गया ।

      सुबह 11 बजे से अपरान्ह तक उत्तराखंड राज्य की राजधानी गैरसैण बनाने की मांग को कई वक्ताओं ने अपने तरीक़े से रखा था । रैली में 'गैरसैण अब दूर नहीं, देहरादून मंजूर नहीं' जैसे कई नारे गूंजते रहे । गैरसैण राजधानी नहीं बनाने को ही विगत 10 वर्षों में राज्य से 5 लाख लोगों के पलायन का मुख्य कारण बताया गया । केंद्र और राज्य सरकार के डबल इंजन से राजधानी गैरसैण बनाये जाने के वायदा निभाने की भी पुरजोर आवाज बुलंद की गई । रैली का समापन इस संकल्प के साथ  हुआ कि जब तक सरकार गैरसैण को राज्य की राजधानी नहीं घोषित करती, राज्य के लोग और राज्य से बाहर खानाबदोश बन गए उत्तराखंडी अपना अहिंसक आंदोलन जारी रखेंगे । डबल इंजन के बाद भी राजधानी गैरसैण नहीं पहुंच सकी । राजधानी एकदिन गैरसैण जरूर जाएगी परन्तु कब जाएगी यह कहना मुश्किल है । अमरावती आंध्र की राजधानी बन गई और हम भिशूण बने रहे क्योंकि हम बुसिल ढुङ्ग हैं । जयहिन्द ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
07.05.2019

Sunday, 5 May 2019

Gairsain : गैरसैण

खरी खरी -424 : एक दिन तो राजधानी गैरसैण जाएगी 


      उत्तराखंड की राजधानी गैरसैण बन गई होती तो करीब 2000 गांव भुतहा (उजड़ गए) नहीं होते । कौन है जिम्मेदार ? 10 मुख्यमंत्री जो हमेशा ही अपनी नौकरी बचाते रहे और बारी बारी से सत्ता रस पीते रहे । काश ! आज कुमाऊं केसरी बद्रीदत्त पांडे जैसे लोग जिंदा होते तो 1921 की तरह आर- पार हो गई होती । इन पुरखों को नमन जो अंग्रेजों से लड़े और आज हमें अपने हक-हकूक के लिए देशी अंग्रेजों से लड़ना पड़ रहा है । बहुत ही दुःखद और शर्मनाक...


      जो मित्र मेरे शब्दों को राजनैतिक रंग देते हैं उन्हें मैं रोक नहीं सकता । कुछ मित्र घुमा-फिरा के गाली भी देते हैं । उन्हें धन्यवाद । मैं देश के सभी नेताओं से अपने सऊर के हिसाब से अपनी बात कहता हूँ । यह मेरा संवैधानिक अधिकार है । आज देश का चिंतन छोड़कर कुर्सी का चिंतन अधिक हो रहा है । स्मरण रहे जब कोई नेता कल कुर्सी पर नहीं रहेगा तो देखने वाली बात यह होगी कि लोग उसे कैसे याद करते हैं ? हम सब जानते हैं कि हम अपने पूर्व के 9 मुख्यमंत्रियों को कैसे याद करते हैं । लोग मेरी आलोचना करते हैं कि 'ये इसका विरोध कर रहा है, उसका विरोध कर रहा है ।' मैं हमेशा उनका विरोध करता हूं जो किये हुए वायदे को भूल जाते हैं, जिनकी कथनी और करनी में अंतर होता है । उत्तराखंड के साथ धोखा करने वालों को थोड़ी तो शर्म आनी चाहिए...


      इन चुनावों में भी राजधानी गैरसैण कूच करना मुद्दा नहीं बन सका । हम 42 शहीदों की आत्मा को शांत नहीं कर सके । जिम्मेवार हम सब हैं । उत्तराखंड के लोग भैंस के आगे बीन बजाते रहे हैं और आगे भी बजायेंगे । यह बीन लक्ष्य प्राप्ति  तक बजते रहेगी । उम्मीद पर खड़े हैं सभी उत्तराखंडी । देर-सबेर गैरसैण लक्ष्य पूरा होगा, भलेही हमारे सामने हो या हमारे चले जाने के बाद । जयहिन्द ।


पूरन चन्द्र काण्डपाल

06.05.2019


Saturday, 4 May 2019

Karm jarooree ; कर्म जरूरी

खरी खरी - 423 : चाह है तो कर्म जरूरी

भोजन सभी को चाहिए लेकिन


खेती करना कोई नहीं चाहता,

पानी सभी को चाहिए लेकिन


पानी बचाना कोई नहीं चाहता,

दूध सभी को चाहिए लेकिन


गाय पालना कोई नहीं चाहता,

छाया सभी को चाहिए लेकिन


पेड़ लगाना कोई नहीं चाहता,

बहू सभी को चाहिए पर


बेटी बचाना कोई नहीं चाहता,

सफलता सबको चाहिये लेकिन


परिश्रम करना कोई नहीं चाहता ,

जागृति सभी चाहते हैं पर 


जागरूकता करना कोई नहीं चाहता ।

नशे से नफरत सभी करते हैं पर


घर के नशेड़ी को कोई नहीं टोकता ।


पूरन चन्द्र काण्डपाल

05.05.2019


Friday, 3 May 2019

Kumauni bhashan : कुमाउनी भाषण बेतालघाट

मीठी मीठी - 269 : बेतालघाट में पैल कुमाउनी भाषण प्रतियोगिता

     20 अप्रैल 2019 हुणि बेतालेश्वर विकास समिति बेतालघाट द्वारा बेतालघाट मिनी स्टेडियम में पैल कुमाउनी कवि सम्मेलन है पैलि नना लिजी कुमाउनी भाषण प्रतियोगता आयोजित करिगे । य प्रतियोगिता में कुल 13 ननाल भाग ल्हे । हरेक प्रतियोगी कैं 4 मिनटक टैम दिइगो । भाषणक 4 विषय छी - पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और रुजगार । निर्णायक लै 4 छी जनूल आपण - आपण हिसाबल दिई हुईं निर्देशोंक अनुसार हरेक प्रतियोगी कैं अंक देईं । निर्णायकोंक  निर्णयक अनुसार संस्था द्वारा तीन नना कैं पैल, दुसर और तिसर पुरस्कार दिईगो जनरि राशि क्रमशः ₹ 5100/-, ₹ 3100/- और ₹ 2100/- छी ।

      नना कि भाषण प्रतियोगिता कैं स्टेडियम में बैठी उपस्थित जनताक खूब समर्थन मिलौ । य सफल आयोजक लिजी महोत्सव संयोजक श्री सुरेन्द्र सिंह हालसी ज्यू और उनरि पुरि टीम कैं भौत -भौत बधै और शुभकामना । य मौक पर बेतालघाट में आपणि भाषा कि बातक दगाड़ 'पहरू', कुर्मांचल अखबार' और 'कुमगढ़' पत्र-पत्रिकाओं  कि लै चर्चा हैछ । आपणि भाषा कैं ज्यौंन धरणा लिजी यास किस्मक कार्यक्रम आयोजित हुण चैनी । अच्याल सांस्कृतिक कार्यक्रमक नाम पर सिर्फ गीत- नृत्य आयोजनोंक ज्यादै प्रचलन हूँरौ । गीत- नृत्य आपणि जाग पर ठीक छ पर यूं आयोजनों में नना लिजी लै कुछ न कुछ प्रतियोगिता हुण चैंछ । बेतालघाट विकास समितिल नना कैं यस किस्मक प्रतियोगी मंच दि बेर हमरि भाषाक प्रचार त करौ, नना में भाषाकि जागरूकता लै पैद करी । यास प्रयासोंल हमरि भाषा कि चर्चा त ह्वलि, हमरि भाषा संविधानक आठूँ अनुसूची में लै पुजलि ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
04.05.2019

Thursday, 2 May 2019

Buraee sahane waale : बुराई सहने वाले

खरी खरी - 422 : बुराई सहने वाले बढ़ गए

     अंग्रेज साहित्यकार शेक्सपियर ने 'मैकबेथ' में लिखा है, " The best of this kind are but shadow, the worst is no worse if imagination amend them."  इसका तातपर्य यह यह है कि इस दुनिया में अच्छा क्या है, बुरा क्या है यह सब किसी के सोचने पर निर्भर करता है । जेब काटना बुरी बात है और यह अपराध भी है । फिर भी जेबकतरे अपना काम अविरल कर रहे हैं बल्कि कुछ तो संरक्षण प्राप्त बताए जाते हैं ।  23 मार्च 2018 को अन्ना की रामलीला मैदान रैली में 100 से अधिक मोबाइल चोरी हुए और जेब तराशी भी खूब हुई । 29 अप्रैल 2018 की राजनैतिक रैली में भी शातिर चोरों ने चांदी काटी । बताया जारहा है कि 50 से अधिक मोबाइल चोरी हुए और 150 से अधिक लोगों की जेब कटी ।

     जेबकतरों के लिए जेब काटना बुरा काम नहीं है । उनके चंगुल में शरीफ लोग ही आते है क्योंकि स्मार्ट व्यक्ति पहले से चौकन्ना रहता है । इसी तरह असामाजिकतत्व भी अपने कार्य को बुरा नहीं मानते । कुछ पकड़े जाते हैं और कुछ डॉन बनकर फिरते रहते हैं । देश की जेलों में करीब साढ़े तीन लाख से अधिक अपराधी हैं जिन्होंने अच्छाई से नाता तोड़ते हुए बुराई से नाता जोड़ा । 22 अप्रैल 2018 से संशोधित दुष्कर्म अपराध कानून एक अध्यादेश के जरिये लागू हुआ है । उस दिन से दुष्कर्म के अपराध घटे नहीं हैं ।

     संक्षेप में कहूँ  तो हमने भी तो बुरे को बुरा कहना छोड़ दिया है ।  एक सत्य यह भी है कि समाज में बुराई बढ़ी नहीं है परन्तु बुराई को सहन करने वाले बढ़ गए हैं । संवेदनशीलता घटते जा रही है । हम बंद नयनों से चुप्पी साधे चूहा दौड़ में चलायमान हैं । जब सभी का यही हाल है तो हालात को बदलेगा कौन ? मित्रों  निराशा के घुप्प अंधेरे से हमें बाहर आने की हिम्मत जुटानी होगी और दिखाना होगा कि हम जिंदी लाश नहीं हैं । जिस दिन जेबकतरों को हमारे जिंदा होने का ऐहसास हो जाएगा उस दिन समा बदल जाएगी, नव-प्रभात का अभिनंदन होगा । तू जिंदा है तो जिंदगी में जीत की यकीन कर...

पूरन चन्द्र काण्डपाल
03.05.2019

Wednesday, 1 May 2019

Mahngaaee : महंगाई रोकने का वायदा

बिरखांत-262 : मंहगाई रोकना भी था एक वायदा 


     जब भी दो - चार लोग आपस में आम बातचीत करते हैं तो बातों - बातों में कुछ  प्रश्न अपने आप आ ही जाते हैं, “और भइ क्या कर रहे हो ? क्या हो रहा है ? जिन्दगी कैसी चल रही है ? आदि- आदि | इस का उत्तर भी बहुत ही साधारण होता है, “बस भाई सब ठीक- ठाक है, गुजारा हो ही रहा है, चल रही है दाल-रोटी |” लेकिन यह उत्तर आज उस तरह का नहीं रहा | रोटी- दाल गरीब से दिनोदिन दूर हो रहे हैं ।  उत्तर भारत के जंगलों में तो टिम्बर माफियों ने आग लगाई बता रहे हैं परन्तु लोग पूछ रहे हैं कि इस दाल में आग किन माफियों ने आग लगाई ? दाल में लगी आग को बुझाने के लिए हमारा केंद्र- राज्य तंत्र तमाशबीन क्यों बन गया है ?


     एक गरीब या आम आदमी को ज़िंदा रहने कि लिए पानी के अलावा मात्र छै वस्तुएं चाहिए – आटा, चावल, दाल, चीनी, चाय और नमक | सब्जी, दूध, घी- तेल, फल की बात नहीं कर रहा जो उससे बहुत दूर हैं | वर्तमान में इन छै वस्तुओं के दाम आम लोगों की पहुंच से दूर हैं । एक गरीब को रोटी जरूर चाहिए परन्तु रोटी खाने के लिए सब्जी नहीं चाहिए क्योंकि वह नमक के पानी में ही रोटी डुबो कर गुजारा कर लेता है और नमक के पानी के साथ ही चावल भी खा लेता है | जिन्दा रहने के लिए जरूरी उक्त छै वस्तुओं के दाम दिनोदिन बढ़ते ही जा रहे हैं जबकि महंगाई रोकने के वायदे पर ही 2014 मई में नई सरकार आयी थी |


     सब्जियों के दामों में उतार- चढ़ाव कुछ हद तक गरीब भी सह लेता है या वह सब्जी खरीदता ही नहीं | प्याज- टमाटर अधिक नहीं तो कम से भी गुजारा हो जाता है परन्तु जिन्दा रहने के लिए जरूरी इन छै वस्तुओं का तो कोई दूसरा विकल्प है ही नहीं | सरकार ने इन छै वस्तुओं पर एक अट्ठनी कम करने के बजाय उलटे 16 रु की नमक की थैली भी 18 रु की कर दी है |  इन वस्तुओं के बढ़ते दामों पर नियंत्रण कौन करेगा ? ये वे गरीब हैं जो न बोल सकते हैं और न जलूस निकाल सकते हैं और शायद ये वोट बैंक पर भी असर नहीं डालते | बीपीएल कार्ड धारकों के अलावा इनकी संख्या करोड़ों में हैं | इन छै वस्तुओं के अभाव में यदि कोई गरीब मर भी जाए तो किसी को क्या फरक पढ़ना है | हमें ओडिशा का कालाहांडी क्षेत्र अभी भूला नहीं है जहां आम की गुठलियां और चूहे खाकर लोग जीवित रहे हैं |


     प्रातः या सायंकालीन सैर में अक्सर वरिष्ठ नागरिकों को देश की वर्तमान ज्वलंत समस्याओं पर चर्चा करते देखा –सुना जाता है | सब एक स्वर- सुर में इस बढ़ती मंहगाई को सरकार की असफलता बताते हैं | कानों पर टकराने वाले चर्चा के कुछ शब्द हैं, “इस महंगाई का आभास हमें चुनाव के दौरान लग गया था जब हमने करोड़ों रुपये के बजट की बड़ी- बड़ी रैलियां देखी थी | उन रैलियों पर जो खर्च हुआ उसकी भरपाई तो होनी ही है |” ये शब्द सत्य प्रतीत होते हैं अन्यथा रातों- रात इन वस्तुओं के दाम क्यों बढ़ गए ? 


      कौन रोकेगा दाल, पेट्रोल, दवाई, सहित जीवन यापन की अन्य वस्तुओं के दामों को ? आखिर किसने दी व्यापारियों को दाम बढ़ाने की यह खुली छूट ? क्यों नहीं लगता बढ़ती महंगाई पर अंकुश ? वर्तमान चुनाव के माहौल में इसकी तो चर्चा भी नहीं है । कौन करेगा चर्चा ? टी वी चैनल प्रायोजित हैं और ऐंकर सुनियोजित । 


पूरन चन्द्र काण्डपाल 

02.05.2019