Wednesday, 12 September 2018

Aane do bitiya ko : आने दो बिटिया को

बिरखांत-229 : आने दो बिटिया को

     मानव को जन्म देने वाली जननी की जन्मने से पहले ही बेख़ौफ़ हत्या के लिए हमारा संकुचित परम्परावादी समाज ही जिम्मेदार है | कन्याओं की गर्भ में ही हत्या कर हम मानवता को अंत की ओर ले जा रहे हैं | महिला रहित समाज की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती फिर भी हम यह कुकृत्य  कर रहे हैं | तकनीक ने हमें शैतान बना दिया, जो हम बीमारी की जानकारी देने वाली मशीन से ह्त्या के लिए कन्या भ्रूण ढूँढने लगे | कुकुरमुत्तों की तरह अवैध गर्भपात केन्द्रों तथा कसाईखाना बन गये नर्सिंगहोमों ने प्रकृति प्रदत मानव लिंग-अनुपात की चूल हिला दी है | (1000/940 वर्ष 2011 ) | यदि इन कसाईखानों को नहीं रोका गया तो बेटों के चहेतों को अपने कुंआरे लाडलों के लिए दुल्हन ढूंढ कर भी नहीं मिलेगी | देश के कुछ राज्यों में यह समस्या दस्तक दे चुकी है |

     लड़कियाँ पैदा होने से पहले ही क्यों मार दी जाती हैं ? जन्मी हुई बेटियां हमें भार क्यों लगती हैं ? हम पुत्रियों की तुलना में पुत्रों को अधिक मान्यता क्यों देते हैं ? हमें बेटा ऐसा क्या दे देगा जो बेटी नहीं दे सकती ? बेटे को चावल और बेटी को भूसा समझने की सोच हमारे मन-मस्तिष्क में क्यों पनपी ? इस तरह के कई प्रश्नों का उत्तर हमें अपनी दूषित -संकुचित मानसिकता एवं कथनी- करनी में बदलाव लाकर स्वत: ही मिल जाएगा | ‘लड़की ससुराल चली जायेगी, लड़का तो हमारे साथ ही रहेगा और सेवा करने वाली दुल्हन के साथ खूब दहेज़ भी लाएगा, जबकि लड़की को पढ़ाने में, फिर उसके विवाह में खर्च होगा और मोटा दहेज़ भी देना पड़ेगा | इतना धन कहां से आएगा ?

      दहेज़ का ‘स्टैण्डर्ड’ भी बढ़ चुका है | इससे अच्छा है दो-चार हजार ‘सफाई’ के दे दो और लाखों बचाओ | फिर बेटा तो सेवा करेगा, वंश चलाएगा, मुखाग्नि और पिंडदान देगा तथा श्राद्ध भी करेगा | लड़की किस काम की ?’ इस तरह की मानसीकता ने ही आज यह सामाजिक समस्या खड़ी कर दी है | कसाई बने चिकित्सकों को दोष भलेही दें परन्तु वास्तविक दोषी तो माता-पिता या दादा-दादी हैं जो दबे पांव कसाइयों के पास जाते हैं |

       पुत्र लालसा ने जनसँख्या के सैलाब को विस्फोटक बना दिया है | बढ़ती जनसंख्या में विकास ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ जैसे लगने लगा है | शिक्षा के प्रसार से लोग इस बात को समझ रहे हैं कि लड़का- लड़की जो भी हो संतान दो ही काफी हैं | आज भी हमारे देश में एक आस्ट्रेलिया की जनता के बराबर जनसख्या प्रतिवर्ष जुड़ती जा रही है | ग्रामीण भारत तथा शहर के पिछड़े तबके में जनसँख्या वृद्धि अधिक है | हमें एक दोष जनसंख्या नीति अपनानी ही होगी जिसमें दो संतान के बाद ग्राम सभा से लेकर संसद तक की सभी सुविधाएं वंचित होनी चाहिए | पड़ोसी देश चीन ने नीति बनाकर ही जनसँख्या पर नियंत्रण कर लिया है |

       जनसँख्या नियंत्रण के आज कई तरीके हैं परन्तु अवैध शल्य  चिकित्सा द्वारा भ्रूण हत्या में महिला को पीड़ा के साथ –साथ बच्चेदानी के अंदरूनी पर्त के क्षतिग्रस्त होने की संभावना भी रहती है | उस समय गर्भ से छुटकारा पाने की जल्दी में ऐसी महिलाओं को वांच्छित पुनः गर्भधारण करने में रुकावट हो सकती है | क़ानून के अनुसार लिंग बताना तथा भ्रूण ह्त्या  करना अपराध है | कुछ ‘कसाइयों’ को इसके लिए दण्डित भी किया जा चुका है |

     दुख की बात तो यह है की अशिक्षित एवं गरीबों के अलावा संपन्न लोग भी लड़के के लिए भटक रहे हैं | काश ! इन लोगों को पुरुषों से कंधे से कंधा मिलाकर आकाश की ऊँचाइयों को छूने वाली अनगिनत महिलायें नजर आती तो शायद ये अपनी बेटियों के साथ कभी अन्याय नहीं करते और दो बेटियों  के आने के बाद किसी लाडले की प्रतीक्षा में परिवार नहीं बढ़ाते | रियो से 2016 में ओलम्पिक दो पदक लाने वाली सिंधु- साक्षी सबके सामने हैं | 18वें एशियाड में भी लड़कियों ने कई पदक जीते ।

    कविता संग्रह ‘स्मृति लहर’ में ‘नारी का ऋण’ कविता में मैंने एक दम्पति के शब्दों को कविता रूप दिया है, “बेटा, बेटा रह सकता है पुत्रवधू के आने तक; बेटी, बेटी ही रहती है अंतिम साँस के जाने तक |” अत: ‘बिटिया को आने दो, मारो मत |’ हमें कन्याभ्रूण हत्या से नहीं बल्कि कन्यादान से अपार सुकून, अनंत सुख और अविरल शांति आजीवन मिलती रहेगी | अगली बिरखांत में कुछ और ...

पूरन चन्द्र काण्डपाल
13.09.2018

Tuesday, 11 September 2018

Uttrayani ki pahal :उत्तरायणी की पहल

मीठी मीठी -160 : 'उत्तरायणी' की एक पहल

        5 सितम्बर 2018 को कांस्टीट्यूसन क्लब नई दिल्ली में 'उत्तरायणी' द्वारा भेंट की गई पुस्तक 'उत्तरायणी'-2017 ('उत्तरायणी' की एक पहल- युवाओं का भविष्य) युवाओं के भविष्य हेतु एक शानदार दस्तावेज है । 184 पृष्ठ की हिंदी और अंग्रेजी में लिखी गई यह पुस्तक युवा पीढ़ी का उत्कृष्ट मार्ग दर्शन  करेगी । पुस्तक में कई विद्वान लेखकों के शब्दों के साथ मेरे शब्दों को भी स्थान देने के लिए संस्था का आभार ।

     5 सितम्बर 2018 को जब यह पुस्तक निःशुल्क वितरित की जा रही थी तो उसी क्रम में मैं भी इसे प्राप्त कर सका । जब भी मुझे कोई पुस्तक/पत्रिका भेंट की जाती है मैं उसे समय निकाल कर अवश्य देखता हूँ औऱ भेंटकर्ता को दो शब्द जरूर लिखता या कहता हूँ । सभागार में यह पुस्तक लगभग सबको मिली । पता नहीं इसे कितने लोग पढ़ेंगे और कितने लोग संस्था को दो शब्द लिखेंगे । मेरा मानना है बहुत कम लोग ऐसा करेंगे । यह मेरा विगत चार दशकों से कलमघसीटी का अनुभव है ।

       'उत्तरायणी' संस्था के अध्यक्ष श्री कृष्ण आर्य (से.नि. IAS ) औऱ उनकी टीम को इस दस्तावेज को प्रकाशित करने के लिये किये गए श्रम हेतु बधाई और शुभकामना । आशा है 'उत्तरायणी' के बढ़ते कदम गंगा की निश्छल धार की तरह अविरल अग्रसर रहेंगे । पुस्तक निःशुल्क संस्था के पास उपलब्ध है ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
12.09.2018

Monday, 10 September 2018

Haryana 18th aishiyad : हरियाणा 18वें एशियाड पदक

मीठी मीठी - 159 : हरियाणा भी भारत में ।

     18वें एशियाड में भारत को 69 पदक मिले थे जिनमें 18 पदक हरियाणा के छोरे-छोरियाँ ने झपट लिए । खुशी की बात सै । सलूट मार के सबनै जयहिन्द बोलण लाग रिया सूं । हरियाणा सरकार बहुत पहले से ही खेलों को बढ़ावा दे रई सै । "दंगल'' हम सब ने देखी । रै आमीर, तन्नै भी राम राम । कुश्ती और बॉक्सिंग में हरियाणा का जबाब नहीं । खिलाड़ियों के पदकों पर भी हरियाणा सरकार ने घणी बारिश कर दी सै । कितना धन बरस रहा है नीचे तालिका पर नजर डालो । देख कर नज़र चहक जाएगी ।

     हरियाणा के खिलाड़ियों को सैल्यूट के साथ जयहिन्द ।अपना राज्य उत्तराखंड के बारे में किसी के पास खेल संबंधी कोई  जानकारी है तो बताने का कष्ट करें । कुछ लिखने-पढ़ने लायक होगा तो जरूर लिखूंगा । खबर 18वें एशियाड से जुड़ी हो ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
11.09.2018

Sunday, 9 September 2018

Girda : गिरदा

मीठी मीठी - 157 :आज 10 सितम्बर, गिरदा कि जयंती

     जनकवि गिरीश चन्द्र तिवारी, "गिरदा" कि आज जयंती छ । उनर जन्म 10 सितम्बर 1945 हुणि ज्योलि, अल्माड़ में हौछ ।  उनार बार में एक लघु लेख "लगुल" किताब में छ, जो याँ उधृत छ । गिरदा कैं विनम्र श्रद्धांजलि । 'ततुक नि लगा उदेख, घुनन मुनइ नि टेक।'

पूरन चन्द्र काण्डपाल

10.09.2018

Saturday, 8 September 2018

Sijeriayan : सिजेरियन प्रसव

खरी खरी - 303 : सामान्य प्रसव उचित, सिजेरियन से कमाई

      मां बनना एक अद्भुत ऐहसास है जिसे प्रत्येक महिला पाना चाहती है ।आज नव-मातृत्त्व में कदम रखने वाली अधिकांश युवतियां शिशु का जन्म नार्मल डिलीवरी (प्राकृतिक प्रसव) के बजाय सिजेरियन से करवा रहीं हैं । सिजेरियन अर्थात महिला के गर्भ से शिशु को सर्जरी (ओप्रेसन) से बाहर निकलना । आजकल यह सुविधानुसार भी होने लगा है ।

      चिकित्सकों के अनुसार नार्मल डिलीवरी में 10 से 15 घंटे का समय लगता है जबकि सिजेरियन से मात्र 30 से 45 मिनट में शिशु बाहर आ जाता है । इससे डॉक्टरों का समय बचता है, प्रसूता को प्रसव पीड़ा से नहीं गुजरना पड़ता । अस्पताल को सिजेरियन से अच्छी कमाई होती है क्योंकि कि प्रसूता को 7- 8 दिन अस्पताल में रहना पड़ता है । सिजेरियन के लिए सीजीएचएस योजना से सरकारी कर्मचारियों का या कारपोरेट कर्मचारियों का कम्पनी द्वारा बिल भुगतान हो जाता है ।

      देश की राजधानी में 70 % डिलीवरी सिजेरियन से प्राइवेट अस्पतालों में हो रही है । अधिकांश महानगरों में 70 से 95 % तक प्रसव सिजेरियन से करवाये जा रहे हैं । नार्मल डिलीवरी एक स्वस्थ परम्परा है जिसे अस्पताल में ही कराया जाना चाहिए । चिकित्सकों के अनुसार सिजेरियन प्रसव से जन्मे बच्चे संघर्ष में अक्षम और निरीह होते हैं वहीं महिलाओं को सिजेरियन के बाद रक्ताल्पता (अनेमिया), मोटापा या उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेसर) जैसे परेशानी हो सकती है ।

      एक समाचार के मुताबिक उन डॉक्टरों पर अब नजर रखी जा रही है जिन्होंने अधिक सिजेरियन किये हैं । मां बनने वाली युवती को उसके परिजनों द्वारा नार्मल प्रसव के लिए प्रोत्साहित किया जाना आज के माहौल में एक सर्वोत्तम बात होगी ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
09.09.2018

Friday, 7 September 2018

Antrarashtriy sakshrata diwas:अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस

मीठी मीठी - 155 : आज अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस

        8 सितंबर 2017 को 51वें अन्तर्राष्ट्ररीय साक्षरता दिवस पर उप-राष्ट्रपति वेंकैया नायडू जी ने नई दिल्ली में कहा , "हर नागरिक एक अनपढ़ को साक्षर बनाये ताकि गरीबी और भ्र्ष्टाचार दूर किया जा सके ।" वेंकैया जी एक नेक दिल, शिष्ट और स्पष्टवादी इंसान हैं । दिवंगत संजय गांधी ने भी देश को 4 नारे दिये थे - 'देश का एक व्यक्ति एक अनपढ़ को पढ़ाये, प्रत्येक व्यक्ति एक पेड़ लगाए, अपना शहर स्वच्छ रखें और परिवार छोटा रखें ।' यह बात सत्तर के दशक के उत्तरार्ध्द की है ।

     1947 में साक्षरता 18 % थी और आज 74% है अर्थात आज भी देश में 26% लोग अनपढ़ हैं । आजादी के 71 साल बाद भी हमारा देश पूर्ण साक्षर नहीं बन पाया, यह बहुत दुख की बात है । वेकैंया जी ने उस अवसर पर कहा 'राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी निरक्षरता को समाज के लिए शर्मनाक और कलंक बताया था ।'

      हमारे सभी राष्ट्रीय लक्ष्य समय पर कभी भी पूरे नहीं होते । देश के अधिकांश स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता में कमी आई है । स्कूली शिक्षा का स्तर भी संतोषजनक नहीं है । एक राज्य के शिक्षकों के ज्ञान की चर्चा कुछ दिन पहले मीडिया में दिखाई गई जो अत्यंत ही सोचनीय थी । स्कूलों में इंफ्रास्ट्रक्चर, शौचालय, पानी और बिजली की कमी आज भी जगजाहिर है । स्कूलों में कहीं विद्यार्थी नहीं तो कहीं शिक्षक नहीं हैं । कुछ स्कूलों में आधा साल बीत जाने के बाद भी बच्चों को पुस्तकें नहीं मिली हैं ।

      ऐसे में हमारा कछुवा तंत्र 2022 तक पूर्ण साक्षरता का लक्ष्य कैसे प्राप्त कर सकेगा ? वेंकैया जी से निवेदन है कि सबसे पहले सुप्त तंत्र को गति प्रदान करने की सोंचें । हमारा विकसित राष्ट्र का सपना कैसे पूरा होगा जब आज भी विश्व के प्रथम 500 विश्वविद्यालयों  में हमारा नाम नहीं है । इसका मुख्य कारण देश प्रत्येक क्षेत्र में अंधविश्वास के भंवर से बाहर आकर वैज्ञानिक सोच को तरजीह नहीं दे पा रहा और अधिकांश समय हिन्दू-मुस्लिम या आरक्षण जैसी  वार्ता -बहस में ही गुजर जाता है ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
08.09.2018

Thursday, 6 September 2018

Insaan banai : इंसान बनै

बिरखांत - 228 : सबसे पहले इंसान बनें हम

     जो लोग समाज के सौहार्द को बिगाड़ते हैं वे कबीर, रहीम, बिहारी, रसखान आदि कालजयी कवियों को नहीं जानते हैं या जानकार भी अनजान बने रहते हैं | इन महामनीषियों ने मनुष्य को इंसान बनाने के लिए, समाज को अंधविश्वास से बाहर निकालने के लिए तथा सामाजिक सौहार्द को बनाये रखने के लिए अथाह प्रयत्न किये | हमारे पुरखों ने स्वतंत्रता संग्राम भी मिलकर लड़ा | महत्वाकांक्षा के अंकुरों ने सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ दिया और इस अंकुर को हमें गुलाम बनाने वाला जाते- जाते मजबूती देकर देश को खंडित कर गया | इस खंडन से मजबह की दीवार को मजबूती मिली और कुछ असामाजिक तत्वों ने नफरत की नर्सरी में अविश्वास के पौधे उगाकर यत्र- तत्र रोपना शुरू कर दिया | उसका जो परिणाम हुआ उसकी चर्चा करने की आवश्कयता नहीं है क्योंकि सबकुछ हम आये दिन देख रहे हैं |

     हमारे समाज में सौहार्द को सींचने वाले भी मौजूद हैं | कुछ दिन पहले कानपुर में गंगा नदी के बैराज पर नौ युवक घूमने गए | एक युवक सेल्फी लेते हुए फिसल कर गंगा नदी में गिर गया और डूबने लगा | उसे बचाने एक के बाद एक सभी दोस्त नदी में कूद पड़े परन्तु डूबने लगे | डूबते हुए युवकों का शोर सुन पास ही में रेत पर बैठा हुआ एक युवक उन्हें बचाने नदी में कूद गया | इसी बीच कुछ नाविकों ने तीन युवक बचा लिए परन्तु वह युवक भी मदद करते हुए नदी में समा गया | बाद में गोताखोरों ने सात शव बहार निकाले | अपनी जान गंवा चुका रेत पर बैठा युवक इन नौ युवकों को नहीं जानता था फिर भी वह इन्हें बचाने के लिए नदी में कूद पड़ा और उन युवकों को बचाते हुए डूब गया | बाद में पता चला कि उसका नाम मक़सूद अहमद था जो एमएससी में अध्ययनरत छात्र था |

     जब मक़सूद अहमद गंगा में नौ युवकों को बचने कूदा होगा उस क्षण उसके मन में हिन्दू- मुसलमान की बात नहीं रही होगी | वह एक मुस्लिम युवक था जिसे उन नौ युवकों के बारे में कुछ भी पता नहीं था | वक्त की मांग पर वह इंसानियत के नाते नौ इंसानों को बचाने के लिए नदी में कूदा  और स्वयं भी जल में समा गया | बात-बात में हिन्दू- मुस्लिम कहने वालों को यह बात समझनी चाहिए कि हम सबसे पहले इंसान हैं, बाद में कुछ और | मक़सूद के साथ अन्य छै का डूब जाना बहुत दुखदायी है | बाद में पता चला कि सभी छै मृतक युवा हिन्दू सम्प्रदाय के थे | एक सेल्फी ने सात अमूल्य जान ले ली | लोगों को चौकन्ना होकर सेल्फी लेनी चाहिए |

     इसी तरह १८ नवम्बर १९९७ को सुबह सवा सात बजे स्कूली बच्चों को ले जारही एक बस यमुना नदी पर बने वजीराबाद पुल की रेलिंग तोड़कर यमुना नदी में गिर गई | इस बस में ११३ बच्चे और २ अध्यापक थे | इस दुर्घटना में २८ बच्चे डूब कर मर गये और ६७ बच्चों को अस्पताल में भर्ती किया गया | इन बच्चों को जगतपुरी दिल्ली निवासी गोताखोर अब्दुल सत्तार खान ने पानी से बहार निकाला | सत्तार ने लगातार ५ घंटे तक ठंडे पानी में डुबकी लगाई और ५० बच्चे बचाए तथा मृत बच्चों के शव बहार निकाले | इतने परिश्रम और ५० बच्चों का जीवन बचाने के बाद सत्तार ने कहा, “अल्लाह ने हुनर दिया तभी बच्चे बचाए | मुझे २८ बच्चों को नहीं बचा पाने  का बहुत मलाल है |” सत्तार मुसलमान था परन्तु वह जीवित बचाए गए बच्चों के लिए एक “इंसान नहीं फ़रिश्ता बन कर आया था”, ये शब्द उन अभिभावकों के थे जो अपने जीवित बच्चों को गले लगाते हुए कह रहे थे |  काश ! हम सबसे पहले एक अच्छे इंसान बन कर सामाजिक सौहार्द को सींचने का काम कर सकते !

पूरन चन्द्र काण्डपाल
07.09.2018