Tuesday, 8 May 2018

Padhi lekhiyan haal : पढ़ी लेखियां हाल

खरी खरी - 233 : पढ़ी लेखियां क हाल

भलेही घर क मंदिर में
राति-ब्याव दी जगूं रयूं,

फिर लै पुछ्यारूंक कूण पर
रोज यथां- उथां भटकैं रयूं,

राम-कृष्ण रामायण-गीता छोड़ि
ओझा-पंड- तांत्रिकों कैं पुजैं रयूं,

आज लै द्याप्तां क नाम पर
खूब उटपटांग पाखंड करैं रयूं ,

पुजपाठ जागरण क नाम पर
जोर-जोरैल लौस्पीकर बजूं रयूं,

बीमार बुजुर्ग विद्यार्थी नानतिन
भलेही क्वे उ रात झन स्येतण,
मि धर्मक काम करैं रयूं ।

( हमरि कुमाउनी भाषा 1100 वर्ष पुराणि छ, यैकैं ज्यौन धरो । य ज्योंन तब रौलि जब सब यकैं व्यवहार में ल्याल । )

पूरन चन्द्र काण्डपाल
08.05.2018

Hunkaar gairsain safal : हुंकार सफल गैरसैण

मीठी मीठी - 106 : सफल रही गैरसैण हुंकार रैली

     इस साल गैरसैण राजधानी मुद्दे पर राजधानी वासियों का 06 मई 2018 को  यह क्रमशः चतुर्थ मिलन था जो एक बड़ी हुंकार रैली के रूप में संसद मार्ग नई दिल्ली पर आयोजित हुआ ।  इससे पहले 03 फरवरी  और 09 फरवरी 2018 को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया नई दिल्ली तथा 10 मार्च 2018 संसद मार्ग नई दिल्ली पर रैली आयोजित की गई । 06 मई 2018 की रैली में आशा के अनुरूप बहुत लोग आए । रैली में राजधानी के विभिन्न क्षेत्रों से लोग पहुंचे जिसमें उत्तराखंड की नारीशक्ति भी मौजूद थी । इस रैली का आयोजन 'उत्तराखंड एकता मंच दिल्ली'  (एकजुट- एकमुठ) के तत्वाधान में किया गया ।

      सुबह 11 बजे से अपरान्ह तक उत्तराखंड राज्य की राजधानी गैरसैण बनाने की मांग को कई वक्ताओं ने अपने तरीक़े से रखा । रैली में 'गैरसैण अब दूर नहीं, देहरादून मंजूर नहीं' जैसे कई नारे गूंजते रहे । गैरसैण राजधानी नहीं बनाने को ही विगत 10 वर्षों में राज्य से 5 लाख लोगों के पलायन का मुख्य कारण बताया गया । केंद्र और राज्य सरकार के डबल इंजन से राजधानी गैरसैण बनाये जाने के वायदा निभाने की भी पुरजोर आवाज बुलंद की गई । रैली का समापन इस संकल्प के साथ  हुआ कि जब तक सरकार गैरसैण को राज्य की राजधानी नहीं घोषित करती, राज्य के लोग और राज्य से बाहर खानाबदोश बन गए उत्तराखंडी अपना अहिंसक आंदोलन जारी रखेंगे ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
07.05.2018

Hunkaar gairsain : हुंकार गैरसैण

खरी खरी -232 : आज संसद मार्ग नई दिल्ली पर गैरसैण की हुंकार

      राजधानी गैरसैण बन गई होती तो 1800 गांव भुतहा (उजड़ गए) नहीं होते । कौन है जिम्मेदार ? 10 मुख्यमंत्री जो हमेशा ही अपनी नौकरी बचाते रहे और बारी बारी से सत्ता रस पीते रहे । काश ! आज कुमाऊं केसरी बद्रीदत्त पांडे जैसे लोग होते तो 1921 की तरह आर-पार हो गई होती । इन पुरखों को नमन जो अंग्रेजों से लड़े और आज हमें अपने हक-हकूक के लिए देशी अंग्रेजों से लड़ना पड़ रहा है । बहुत ही दुःखद और शर्मनाक...

      आज 6 मई 2018 को 11 बजे सुबह संसद मार्ग नई दिल्ली पर हुंकार रैली में पुनः भैंस के आगे बीन बजायेंगे । यह बीन लक्ष्य प्राप्ति  तक बजते रहेगी ।उम्मीद पर खड़े हैं सभी उत्तराखंडी । देर-सबेर गैरसैण लक्ष्य पूरा होगा, भलेही हमारे सामने हो या हमारे चले जाने के बाद । जयहिन्द ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
06.05.2018

Friday, 4 May 2018

Pattharbaaji : पत्थरबाजी

खरी खरी -231 : स्कूल बस पर पथराव

    02 मई 2018 को जम्मू-कश्मीर के शोपियां जिले के जावोरा गांव में एक स्कूल बस पर कुछ अराजक तत्वों ने पथराव किया जिसमें दो बच्चे घायल हो गए । घायल बच्चों को सुरक्षकर्मियों ने अस्पताल में भर्ती करवाया । इन मासूम बच्चों ने किसी का कुछ नहीं बिगड़ा था । वे तो यह भी नहीं जानते थे कि कौन और क्यों उन पर पत्थर बरसा रहा है ?

     यह कायराना हमला मुठभेड़ में मारे गए आतंकवादियों के समर्थन में था । राज्य में पत्थरबाजों पर नकेल नहीं लग रही है । पत्थरबाज सरकारी माफी का गलत लाभ उठा रहे हैं । पत्थरबाजों पर रहम की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए और कानून को इन देशद्रोहियों से सख्ती के साथ निपटना चाहिए ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
05.05.2018

Thursday, 3 May 2018

Alag mandir : अलग मंदिर अलग द्याप्त

खरी खरी - 230 : अलग मंदिर अलग दयाप्त

गौंनू में मंदिरों कि कमी न्हैति
फिर लै मंदिर बनूं रईं,
हर साल वां जै बेर
घंटी - बाकर चढूं रईं,
वां सबूं के अलग- अलग
नईं -पुराण दयाप्त देखीं रईं,
क्वे कैहूं क्ये नि कान
एक-दुसरै नकल करैं रईं ।

घंटी कि जाग कैं इस्कूल हैं
एक बाल्टी लै ऐ सकछी,
बोरिया चेथाड़ में भैटी नना हैं
एक चटाई लै ऐ सकछी,
गरीब नना हैं स्टेसनरी
बस्त वर्दी बनैन लै ऐ सकछी,
इस्कूलाक पुस्तकालय हैं
थ्वाड़ भौत किताब लै ऐ सकछी ।

पूरन चन्द्र काण्डपाल
04.05.2018

Wednesday, 2 May 2018

Jeewan n rahne par : जीवन नहीं रहने पर

बिरखांत -210 : जीवन नहीं रहने पर

    कुछ दिन पहले एक राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्र में पढ़ा कि जाने- माने कवि एवं लेखक अशोक चक्रधर (पद्मश्री) जी ने भी मृत्युपरांत अपनी देह का दान कर दिया है | इससे पहले विख्यात साहित्यकार विष्णु प्रभाकर जी ने भी देहदान किया था | कितने ही लोग देहदान या अंगदान करते होंगे, सबका पता नहीं लग पाता जबकि हमारे देश में देहदान करने वालों के संख्या कम ही बतायी जाती है |

     मृत्यु के बाद अपनी देह का दान करना बहुत बड़ा पुण्य-  कर्म है और यदि मोक्ष है तो यही है | मरने के बाद यह शरीर किसी के काम आ जाए तो इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है ?अंततः शरीर ने तो राख होकर पंचतत्व में मिलना ही है | हमारे देश में कई धर्मों के अनुयायी हैं जिनमें बताया जाता है कि जोरास्टर लोग शव को एक टावर में रखते हैं जहां वह चील, कौवे और गिद्धों का सुलभ भोजन बन जाता है |

     देहदान से क्या होगा ? अभी तक समाज में इस प्रश्न की चर्चा भी अच्छी नहीं समझी जाती जैसे आज से पचास वर्ष पहले वीमा करने की चर्चा का अर्थ होता था कि ‘ये आदमी मरने की बात कर रहा है |’ आज समझदार लोग वीमा अवश्य करते हैं | जीते जी जमा राशि मिल जाय तो अपने लिए उत्तम और मरने के बाद अपनों के लिए उत्तम | हमारे समाज में शरीर दान तो छोड़ो, नेत्र दान की बात भी लोगों को अच्छी नहीं लगती| हाँ, लोगों को किसी के मरने पर ‘वह इतने अंग दान कर गया’ की खबर शायद अच्छी लगती है |

     अब कुछ लोग नेत्रदान करने लगे हैं परन्तु यह मृत्यु के छै घंटे के अन्दर हो जाना चाहिए | मृत्यु के बाद देहदान समाज के लिए बहुत उपयोगी है| शरीर के बहुत से अंग जैसे दिल, दिमाग,  गुर्दे, लीवर, पित्ताशय, आँख, आंत, फेफड़े, पेट की झिल्ली, कार्टिलेज, कौर्ड,  वाल्व, पंक्रियाज,  हड्डियाँ, मज्जा, त्वचा आदि मृत्यु के कुछ घंटे बाद भी किसी अन्य के काम आ सकते हैं | कौमा में गए व्यक्ति (ब्रेन डेथ) का तो अंग-अंग उपयोग में लाया जा सकता है बसर्ते उसके स्वजन तैयार हो जाएं |

    कैसे करें देहदान ? देहदान हम जीते जी स्वयं भी कर सकते हैं और किसी के वारिस भी यह पुण्य- कर्म कर सकते हैं |किसी भी मेडिकल कालेज (जैसे के मौलाना आजाद मेडिकल कालेज) के अनाटॉमी विभाग में जाकर फार्म भर दीजिये या फार्म घर भी मांगाया जा सकता है | मृत्यु में बाद जो परिजन शव को दाह के लिए ले जाने के बजाय इस कालेज को सूचित करते हैं | वहाँ से अम्बुलेंस स्टाफ सहित आती है जो शव को ले जाती है | शव को वहाँ पहुंचाने के लिए कुछ परिजन जाते हैं जो वहां कुछ कागजों में हस्ताक्षर करते हैं | देश के मेडिकल कालेजों में भावी चिकित्सकों को प्रशिक्षण देने के लिए शवों के बहुत कमी है जबकि श्मशान घाटों में अनगिनत चिताएं रोज जलती हैं | मेडिकल कालेज भी प्रशिक्षण के बाद अंत में शव को स्वयं के इंसीनिरेटर (स्वचालित भट्टी ) में अपने स्टाफ द्वारा अग्नि को सुपुर्द कर उस राख को किसी वृक्ष के तले धरा में विसर्जित कर देते हैं |

     हम यह नहीं जानते कि कौन कब, कहां और कैसे इस शरीर का त्याग करेगा? फिर भी हरेक व्यक्ति की यही इच्छा होती है कि वह जीवन के अंतिम दिनों में अपनों के बीच रह कर इस देह को छोड़े| उसके मरने के बाद उसके शरीर पर उसके परिजनों (वारिसों) का हक़ होता है जो स्वेच्छा से उसका अंतिम संस्कार करते हैं | इस संस्कार में कर्मकांड के ठेकेदार उसका अंधाधुंध शोषण भी करते हैं और उसे अपनी ही परिधि में बांधे रखने का भरपूर प्रयास करते हैं, उसे धर्म या यम के नाम से डराते हैं |

      यदि मृतक द्वारा अपनों से अपने देहदान की चर्चा की गई होगी तो वे अवश्य ही उस नेक कर्म को पूरा करेंगे और किसी भी प्रकार के अन्धविश्वास का शिकार नहीं होंगे | यदि मोक्ष नाम की कोई चीज है तो वह देहदान ही है | इस महादान के लिए अभी बहुत जनजागृति की आवश्यकता है | देहदान के बारे में एम ए एम सी फोन नंबर ०११-२२७१४६८९ से संपर्क भी किया जा सकता है | इन पंक्तियों का लेखक होने के नाते बताना चाहूंगा कि मैं वही कहता या लिखता हूँ जिसे मैं स्वयं क्रियान्वित किया जा सकता है | मेरा संकेत स्पष्ट है | अगली बिरखांत में कुछ और ...

पूरन चन्द्र काण्डपाल,
03.05.2018

Bura to hai hee bura : बुरा तो है ही बुरा

खरी खरी - 229 : बुरा तो है ही बुरा

     अंग्रेज साहित्यकार शेक्सपियर ने 'मैकबेथ' में लिखा है, " The best of this kind are but shadow, the worst is no worse if imagination amend them."  इसका तातपर्य यह यह है कि इस दुनिया में अच्छा क्या है, बुरा क्या है यह सब किसी के सोचने पर निर्भर करता है । जेब काटना बुरी बात है और यह अपराध भी है । फिर भी जेबकतरे अपना काम अविरल कर रहे हैं बल्कि कुछ तो संरक्षण प्राप्त बताए जाते हैं ।  23 मार्च 2018 को अन्ना की रामलीला मैदान रैली में 100 से अधिक मोबाइल चोरी हुए और जेब तराशी भी खूब हुई । 29 अप्रैल 2018 की राजनैतिक रैली में भी शातिर चोरों ने चांदी काटी । बताया जारहा है कि 50 से अधिक मोबाइल चोरी हुए और 150 से अधिक लोगों की जेब कटी ।

     जेबकतरों के लिए जेब काटना बुरा काम नहीं है । उनके चंगुल में शरीफ लोग ही आते है क्योंकि स्मार्ट व्यक्ति पहले से चौकन्ना रहता है । इसी तरह असामाजिकतत्व भी अपने कार्य को बुरा नहीं मानते । कुछ पकड़े जाते हैं और कुछ डॉन बनकर फिरते रहते हैं । देश की जेलों में करीब साढ़े तीन लाख से अधिक अपराधी हैं जिन्होंने अच्छाई से नाता तोड़ते हुए बुराई से नाता जोड़ा । 22 अप्रैल 2018 से संशोधित दुष्कर्म अपराध कानून एक अध्यादेश के जरिये लागू हुआ है । उस दिन से दुष्कर्म के अपराध घटे नहीं हैं ।

     संक्षेप में कहूं तो हमने भी तो बुरे को बुरा कहना छोड़ दिया है ।  एक सत्य यह भी है कि समाज में बुराई बढ़ी नहीं है परन्तु बुराई को सहन करने वाले बढ़ गए हैं । संवेदनशीलता घटते जा रही है । हम बंद नयनों से चुप्पी साधे चूहा दौड़ में चलायमान हैं । जब सभी का यही हाल है तो हालात को बदलेगा कौन ? मित्रों  निराशा के घुप्प अंधेरे से हमें बाहर आने की हिम्मत जुटानी होगी और दिखाना होगा कि हम जिंदी लाश नहीं हैं । जिस दिन जेबकतरों को हमारे जिंदा होने का ऐहसास हो जाएगा उस दिन समा बदल जाएगी, नव-प्रभात का अभिनंदन होगा । तू जिंदा है तो जिंदगी में जीत की यकीन कर...

पूरन चन्द्र काण्डपाल
02.05.2018